दिल्ली की राजनीति में 10 फरवरी का दिन ऐतिहासिक है। जब 3 साल पहले विधानसभा चुनाव के नतीजे आए और सबसे बड़े नेता होने का गुरुर कर रहे PM मोदी के पैरों तले जमीन खिसक गई।

महज 9 महीने पहले पूरा देश फतह करने वाले PM मोदी भाजपा का गढ़ बन चुकी दिल्ली में ही मात खा गए। उन्हें इस बात का अंदाजा भी नहीं रहा होगा जिस दिल्ली में 7 के 7 लोकसभा सीट भारतीय जनता पार्टी ने जीत ली है कुछ महीनों में केजरीवाल की राजनीति सब कुछ बदल देगी।

16 मई 2014 से 10 फरवरी 2015 तक तस्वीर ऐसी बदली कि चुनाव परिणाम के दिन एक भी सीट न पाने वाली कांग्रेस भी जश्न मना रही थी क्योंकि खुद को अजेय मान चुकी भारतीय जनता पार्टी की सबसे बुरी हार हुई थी और संभवतः यह पीएम मोदी की सर्वशक्तिमान की छवि को पहला जोरदार झटका था।

चुनाव प्रचार की खास बात ये भी थी कि PM मोदी ने अपना सब कुछ दाँव पर लगा दिया था।

अपने भाषणों में वह कुछ ऐसा बोलते थे कि मानो देश के प्रधानमंत्री केजरीवाल हों और वह विपक्ष के नेता मात्र।

दिल्ली की सभी अनियमितताओं और बदहाली का जिम्मेदार उस राजनेता को बताते थे जो सत्ता में महज 49 दिन रहा था ।

मोदी के बड़े मंच और चुनावी रैलियों की काट खोजने निकले केजरीवाल के लिए राहें आसान नहीं थी लेकिन गली-गली घूम कर छोटी-छोटी मोहल्ला सभाएं करके जिस तरह से दिल्ली के लाखों लोगों के दिल में केजरीवाल बस गए और विपरीत परिस्थितियों को मात देताहुए खुद को ताकतवर और शातिर नेता साबित करने में सफल रहे, उसे नाकारा नहीं जा सकता।

ये चुनाव इस लिहाज से भी अहम था कि लोकसभा चुनाव में भारी विजय के बाद चार राज्यों के विधानसभा चुनाव में भी भारतीय जनता पार्टी जीत का परचम लहराने में सफल रही थी।

सवाल उठने लगा था क्या नरेंद्र मोदी के विजय रथ को कोई रोक पायेगा ?

लेकिन केजरीवाल की रणनीतियां और नेतृत्व क्षमता और आम आदमी पार्टी के वॉलेंटियर्स ने वो कर दिखाया जो इतिहास में बहुत कम ही बार हुआ है।

70 में से 67 सीटों पर विजय के बाद 14 फरवरी 2015 को केजरीवाल ने मुख्यमंत्री के तौर पर दोबारा शपथ लिया और तब से अभी CM के पद पर बने हुए हैं। साथ ही केंद्र और राज्य के बीच लगातार घमासान जारी है।
समूचे रूप से कुछ भी ऐतिहासिक करने में वह सफल नहीं हुए हैं लेकिन अधिकार क्षेत्र में आने वाले शिक्षा और स्वास्थ्य क्षेत्र में जो बेहतरीन किया है, उससे इनकार नही किया जा सकता है।
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