डॉ. राम मनोहर लोहिया एक ऐसे भारतीय स्वतंत्रता सेनानी, समाजवादी प्रखर चिंतक और सम्मानित राजनीतिज्ञ। आज इनकी 50वीं पुण्यतिथि है।

23 मार्च 1910 को उत्तर प्रदेश के फैजाबाद में जन्मे डॉ लोहिया ने सच का साथ देते हुए आजादी की लड़ाई में अद्धभुत काम किया था। अपनी राजनीति के दम पर इन्होंने भारत की राजनीति में स्वतंत्रता आंदोलन का रुख बदल दिया था। उनकी देश के लिए देशभक्ति और उनके विचारों से उनके विरोधी भी उनका सम्मान करते थे।

लोहिया ने युवा अवस्था से ही विभिन्न रैलियों और विरोधी सभाओं में जाना शुरू कर दिया था। जिसके माध्यम से उनको भारत के स्वतंत्रता आंदोलनों में भाग लेने के प्रेरणा मिलती थी। उनके जीवन में मोड़ तब आया जब उन्होंने महात्मा गांधी के व्यक्तित्व और सोच से बहुत प्रेरित हुए थे और उन्होंने जीवन पर्यन्त गांधी के आदर्शों का समर्थन किया था।

साल 1921 में वह पंडित जवाहर लाल नेहरू से पहली बार मिले थे तथा उनकी देखरेख में काम कर रहे थे। लेकिन कुछ समय बाद दोनों के बीच विभिन्न मुद्दों और राजनीतिक सिद्धांतों के चलते टकराव होने लगे। उन्होंने 18 साल की उम्र में साल 1928 में ब्रिटिश सरकार द्वारा गठित ‘साइमन कमीशन’ का विरोध करने के लिए प्रदर्शन का आयोजन किया।

लोहिया का कहना था कि भारत जैसे देश में अंग्रेजी ने शिक्षित और अशिक्षित लोगों के बीच दूरी बना दी है इसीलिए उन्होंने हिंदी को प्राथमिकता दी। वह हमेशा जाति व्यवस्था के विरोध में रहे। इस मामले पर उनका सुझाव था कि रोटी और बेटी के माध्यम से जाति व्यवस्था को खत्म किया जा सकता है।

उनका मानना था कि सभी जाति के लोग एक साथ मिल-जुलकर खाना खाएं और उच्च वर्ग के लोग निम्न जाति की लड़कियों से अपने बच्चों की शादी करें। इसी के चलते उन्होंने ‘यूनाइटेड सोशलिस्ट पार्टी’ में उच्च पदों के लिए हुए चुनाव के टिकट निम्न जाति के उम्मीदवारों को दिया और उन्हें प्रोत्साहन भी दिया।

स्वतंत्रता आंदोलन को लेकर उनके मन में हमेशा से इच्छा थी कि वह आंदोलन में भाग जरूर लेंगे। इसी के चलते जब वह यूरोप में थे तो उन्होंने वहां एक क्लब बनाया जिसका नाम था ‘असोसिएशन ऑफ यूरोपियन इंडियंस।’ इस क्लब का उद्देश्य था यूरोपीय भारतीयों के अंदर भारतीय राष्ट्रवाद के प्रति जागरूकता पैदा करना।

लोहिया ने जिनेवा में ‘लीग ऑफ नेशन्स’ की सभा में भी भाग लिया, लेकिन भारत का प्रतिनिधित्व ब्रिटिश राज्य के एक सहयोगी के रूप में बीकानेर के महाराजा द्वारा किया गया था, लेकिन लोहिया इसके अपवाद थे। उन्होंने दर्शक गैलरी से इसका विरोध प्रदर्शन करना शुरू कर दिया था और बाद में अपने विरोध के कारणों को स्पष्ट करने के लिए उन्होंने समाचार-पत्र और पत्रिकाओं के संपादकों को कई पत्र लिखे।

इस पूरी घटना के चलते वह रातों-रात भारत में एक सुपर स्टार बन गए थे। लोहिया के भारत वापस आने पर वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस पार्टी में शामिल हो गए और साल 1934 में कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी की आधारशिला रखी। वर्ष 1936 में पंडित जवाहर लाल नेहरू ने उन्हें अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी का पहला सचिव नियुक्त किया।

साल 1939 दिनांक 24 मई को लोहिया को उत्तेजक बयान देने और देशवासियों से सरकारी संस्थाओं का बहिष्कार करने के लिए लिए पहली बार गिरफ्तार किया गया, लेकिन युवाओं के विद्रोह के डर से उन्हें अगले ही दिन रिहा कर दिया गया।

हालांकि जून 1940 में उन्हें ”सत्याग्रह नाउ” नामक लेख लिखने के आरोप में दोबारा गिरफ्तार किया गया और दो सालों के लिए जेल भेज दिया गया। बाद में उन्हें दिसम्बर 1941 में आज़ाद कर दिया गया। वहीं भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान साल 1942 में महात्मा गांधी, नेहरू, मौलाना आजाद और वल्लभभाई पटेल जैसे कई शीर्ष नेताओं के साथ उन्हें भी कैद कर लिया गया था।

जिसके चलते वह दो बार जेल गए, एक बार उन्हें मुंबई में गिरफ्तार कर लाहौर जेल भेजा गया था और दूसरी बार पुर्तगाली सरकार के खिलाफ भाषण और सभा करने के आरोप में गोवा। जब भारत स्वतंत्र होने के करीब था तो उन्होंने अपने लेखों और भाषणों के द्वारा देश के विभाजन का विरोध किया था। वे देश का विभाजन हिंसा से करने के खिलाफ थे।

बताया जाता है कि जब आजादी के दिन सभी नेता 15 अगस्त, 1947 को दिल्ली में इकट्ठे हुए थे, उस समय वे भारत के अवांछित विभाजन के प्रभाव के शोक की वजह से अपने महात्मा गाँधी के साथ दिल्ली से बाहर थे।

डॉ राम मनोहर लोहिया आजादी के बाद भी राष्ट्र के पुनर्निर्माण के लिए अपना योगदान देते रहे। उन्होंने आम जनता और निजी भागीदारों से अपील की कि वह कुओं, नहरों और सड़कों का निर्माण कर राष्ट्र के पुनर्निर्माण में सहयोग दें।

लोहिया ने तीन आना, पन्द्रह आना के जरिए प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू पर होने वाले खर्च की राशि जो उस समय एक दिन का 25 हजार रुपए थी उसके खिलाफ आवाज उठायी थी जो आज भी लोगों के जहन में हैं। बताया जाता है उस समय भारत की अधिकांश जनता की एक दिन की आमदनी मात्र 3 रुपए थी जबकि भारत के योजना आयोग के आंकड़े के अनुसार प्रति व्यक्ति औसत आय 15 आना थी।

बता दें कि डॉ राम मनोहर लोहिया ने उन मुद्दों को उठाया जो लंबे समय से राष्ट्र की सफलता में बाधा उत्पन्न कर रहे थे। उन्होंने अपने भाषण और लेखन के माध्यम से जागरूकता पैदा करने, अमीर-गरीब की खाई, जातिगत असमानताओं और स्त्री-पुरुष असमानताओं को दूर करने कि बात कही और हर संभव कोशिश कि।

उन्होंने कृषि से सम्बंधित समस्याओं के आपसी निपटारे के लिए ‘हिन्द किसान पंचायत’ का गठन किया। वे सरकार की केंद्रीकृत योजनों को जनता के हाथों में देकर अधिक शक्ति प्रदान करने के पक्षधर थे। अपने अंतिम कुछ सालों के दौरान उन्होंने देश की युवा पीढ़ी के साथ राजनीति, भारतीय साहित्य और कला जैसे विषयों पर चर्चा कि जिससे इन चीजों पर ध्यान दिया जा सके।

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