सोहराबुद्दीन मामले को देख रहे सीबीआई जज बीएच लोया की संदिग्ध परिस्तिथियों में मौत हो जाने की द कारवां में आई रिपोर्ट के बाद ये सवाल लगातार उठ रहा है, क्यों अभी तक सरकार से लेकर मीडिया तक इस मामले को तवज्जों ने नहीं दे रहा है।

क्या हमारे देश में एक न्यायधीश की जान इतनी सस्ती हो गई है या पिछले कुछ समय में देश के समाज में इतना डर भर दिया गया है कि कोई भी सवाल नहीं उठा पा रहा है।

बता दें, कि सुप्रीम कोर्ट ने इस मामलें की कार्रवाई गुजरात से बाहर करने का आदेश दिया था जिसके बाद ये मामला सीबीआई अदालत में आया। यहाँ इस मामले को देख रहे पहले न्यायाधीश उत्पत ने अमित शाह को मामले की कार्रवाई में उपस्थित न होने को लेकर फटकार लगाई थी। लेकिन अगली तारीख से पहले ही उनका ट्रान्सफर हो गया।

इसके बाद बृजगोपाल लोया आये, उन्होंने भी अमित शाह के उपस्थित न होने पर सवाल उठाए और सुनवाई की तारिख 15 दिसम्बर 2014 तय की लेकिन 1 दिसम्बर को ही उनकी मौत हो गई। इसके बाद न्यायधीश एमबी गोसवी आये, जिन्होंने दिसम्बर 2014 के अंत में ही अमित शाह को इस मामले में बरी कर दिया।

लातूर बार एसोसिएशन जस्टिस लोया की संदिग्ध परिस्थितियों में हुई मौत की जांच कराने के लिए प्रस्ताव कर चुका है। दिल्ली हाईकोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश और विधि आयोग के अध्यक्ष एपी शाह ने भी लोया की मौत की जांच की मांग की है। लेकिन सरकार इतनी बेशरम हो चुकी है कि जांच कराने का नाम नहीं ले रही हैं।

ये विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र के लिए बहुत ही सोचनीय स्थिति है। जब छत्तीसगढ़ में एक मंत्री की सीडी लीक होने की सीबीआई जांच हो रही है और जज की मौत पर उसका परिवार ही जांच की मांग कर रहा है तब भी सरकार ने चुप्पी साध रखी है।

न्यायपालिका, जिसे देश में सही और गलत की परिभाषा देने और इस देश के लोगों के अधिकारों की रक्षा करने का अधिकार है, जब उसके लोग ही डर के साए में जीने लगेंगे तो आप को इन्साफ कौन देगा। इसीलिए कम से कम समाज के लिए न सही लेकिन स्वार्थी होकर अपने लिए ही सही हमें आवाज़ उठानी होगी।

कहीं हम लोकतंत्र के सबसे बुरे दौर में तो नहीं हैं, जहाँ हम राजनीतिक पार्टियों के इतने बड़े भक्त हो चुके हैं कि हम अपने भक्ति के एवज़ में एक जज की हत्या को भी बर्दाश्त करने के लिए तैयार हैं। इस तरह की भक्ति हमें देश के संविधान और लोकतंत्र की विरुद्ध खड़ा कर रही है।

द कारवां की रिपोर्ट में जिन बात का उल्लेख करती है उससे ये सम्भावना पैदा होती है कि कहीं न कहीं किसी न किसी के हाथ तो जस्टिस लोया के खून से रंगे हैं।  राजनीति और सिस्टम पर इस बात को छोड़ा नहीं जा सकता क्योंकि वो खुद इसमें शक के घेरे में हैं। शायद इसीलिए  इसकी जांच को टाला जा रहा है।

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