दिलबहार दिल्ली,

दिल्ली मेरी जान। आज तुमसे बतियाने का जी कर रहा है। फरवरी की ठंड में मार्च की गरमाहट की आहट महसूस होने लगी है। सोचा, क्यों न तुम्हें एक ख़त लिखा जाए, दिल ओ जान से मुबारकबाद कहते हुए। हिन्दुस्तान की हुकूमत का दिल हो तुम। तुम्हारे इक़बाल से लोगों के हलक सूख जाते हैं। तुम हमारे सपनों का मरकज़ हो, केंद्र हो। दूर गांव से तुम्हें देखता हूं तो तुम एक सपने की तरह नज़र आती हो। धड़क सी जाती हो हमारे सीने पर। करीब आकर देखता हूं तो लगता है कि छाती पर कोई लठैत बैठा है। ये सरकार, वो सरकार। इसकी सरकार, उसकी सरकार। मालिक मुख़्तार मेरी दिल्ली, मेरी जान तो हो, इसलिए जान तो मत लो।

जब भी टीवी खोलता हूं, तुम ही तुम नज़र आती हो। मुल्क है तो दिल्ली है। दिल्ली ही तो हिन्दुस्तान है। यहां की सड़कें, यहां का जाम, यहां की हवा, यहां का कचरा, यहां का स्कूल, यहां का कालेज… खबरों को देखकर लगता है कि तुम्हें शांति नहीं है। न तुम शांत हो, न किसी को शांत रहने दोगी। सायरन वाली गाड़ियां, अचकन वाले नेता। बयानों को लेकर छत की मुंडेर पर नेता बैठे नज़र आते हैं। एक हाथ से कबूतर उड़ाते हैं और एक हाथ से बयान चलाते हैं। कोई तुम्हें एक बार टीवी पर देख ले तो उसका कलेजा पत्थर का हो जाए।

सुनो दिल्ली मेरी जान, ज़रा सुस्ता लो। तुम्हारे आंगन में सत्ता की जो कुर्सियां हैं उन्हें आग में झोंक दो। आजाद हो जाओ तुम, एनडीएमसी से, एमसीडी से, दिल्ली सरकार से, केंद्र सरकार से। तुम निगमों और मंत्रियों के बोझ से दबने लगी हो। बादशाहों के इस शहर में हम प्यादों की सुन लो। बहुत देखे तुमने बादशाह। हमारे जैसे शहंशाह कम मिलेंगे जिनकी हैसियत प्यादे की है मगर दिल शहंशाह का। तुम सबसे कह दो कि दिल्ली किसी की नहीं है। जिन्हें हुकूमत करनी है वे गुड़गांव चले जाएं, ग्रेटर नोएडा चले जाएं, फरीदाबाद चले जाएं, मगर दिल्ली को अकेला छोड़ दें। कुछ पल के लिए इस शहर को बैरिकेडों से आजाद कर दें। गोया कि कभी इस शहर का वास्ता किसी बादशाह से पड़ा ही न हो। हुकूमतों के कारण यहां कोई तंगदिल हो गया है तो कोई संगदिल। दिल ही नहीं है फिर भी नाम है कि दिल्ली है।

दिल्ली मेरी जान। महीना फरवरी का और दिल जून सा। कब तक तुम बेमौसम बेनूर रहोगी। तुम्हारी फ़िज़ा को नज़र लग गई है। यह मोहब्बत का महीना है, आबाद कर दो यहां के जवां दिलों को। लोग बात करें तो ज़ुबान से इश्क टपके, ख्वाब देखें तो महबूब के सिवा कोई दूसरा न हो। ख़ामोश हो जाएं तो लगे कि इश्क़ का सदक़ा लगा हो। कोई उर्दू बोले तो कोई हिन्दुस्तानी। आओ संस्कृत भी बोल लो और लिखने लगो ईरानी। मित्रो मरजाणी की दिल्ली, तुम फिर से मोहब्बत को आबाद कर दो। लगे कि इस शहर से हुकूमतें चली गईं हैं। हड़तालें जमींदोज़ हो गई हैं, मिट्टी में मिल गई हैं। गालियां अब निकलती नहीं हैं और लठैत अब मिलते नहीं हैं। बस दो दिल मिलते हैं, कहीं किसी अनजान कोने में। गालिब की गज़ल पढ़ते हुए, कृष्णा सोबती की कहानियों में डूबते हुए। कुर्रतुल ऐन हैदर का आग का दरिया पढ़ते हुए कोई घोड़े पर सवार हो जाए, तमाम कालों के भारत को पार करता हुआ, अमिताभ घोष के जहाज़ पर सवार होकर अफ़ीम के व्यापारियों के साथ चीन चला जाए। वहां से लौटकर आए तो अरब सागर के किनारे की मुंबई को आबाद कर दे। फिर लौटकर दिल्ली आए तो अहमद फ़राज़ की गज़ल सुनने लगे- ‘रंजिश ही सही दिल को दुखाने के लिए आ, आ फिर से मुझे छोड़के जाने के लिए आ…।’

दिल्ली, तुम एक किताब बन जाओ, ज़िंदा किताब। काफीटेबल किताबों से भी तुम्हें आज़ाद होना है। अपने शहरियों को मोहब्बत के नग़मे सुनाना है। यह आज की शाम कोई ऐसी वैसी शाम नहीं है, फरवरी का महीना है। सनसनी सी है दिलों में। आओ चलो चलते हैं नेहरू पार्क की खाली पड़ी बेंच पर बैठकर ऊंचे-ऊंचे दरख़्तों को निहारते हैं। राम का लड्डू खाते हैं और दही-भल्ला पैक करा लेते हैं। एक-दूसरे को छूकर आते हैं, एक-दूसरे का होकर आते हैं। दिल्ली में रहते हैं, चलो आदमी होकर आते हैं। आशिक होकर आते हैं, महबूब बनकर आते हैं, माशूक बनकर आते हैं।

दिल्ली तुम दिल्ली बन जाओ, तुम फिर से धड़कने लगो। तुम मुझे धड़का दो, तुम उसे धड़का दो। हमारे लिए तुम ज़िंदा हो जाओ, हमें तुम ज़िंदा कर दो। हम, जिसे सियासत ने मुर्दा में बदल दिया है लेकिन हमारे जी उठने से पहले तुम दिल्ली बन जाओ। हम दिल्ली के लिए जागना चाहते हैं। दिल्ली के लिए जीना चाहते हैं। हुकूमतें नाक़ाबिले बर्दाश्त होती जा रही हैं। ख़्वाब हैं कि नारों से लगते हैं। तुम हमारे ख़्वाब लौटा दो। दिल्ली तुम दिल्ली बनकर लौट आओ। इस ख़त को पढ़ते ही सीने में छिपा लेना, यमुना में मत बहा देना। अरे हां बताना भूल गया। तुम्हारी यमुना अब है ही कहां।

तुम्हारे इंतज़ार में
रवीश कुमार

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