दंगा या फसाद होने पर,

फसलों के बर्बाद होने पर,

दलितों पे हुए अत्याचार पर,

स्त्रियों के साथ दुराचार पर,

जवानों की शहादत में,

बर्बरता-पूर्ण क़यामत में,

किसानों पे चली गोलियों पर,

ग़ुरबत से मरे मजलूमों पर,

गाय के नाम पे हो रही हत्याओं पर,

भीड़ के उन भेडियों की करतूतों पर,

आतंकी गतिविधियों पर,

और अब यात्रियों पे हुए इन हमलों पर.

वो उतरता है जहाज से और करता है निंदा

उन सभी घटनाओं की,

उसे खेद है की ये सब हुआ कैसे,

फिर साध लेता है चुप्पी किसी अनजान के माफिक.

फिर चढ़ता है उड़न-खटोले में,

और देखते ही देखते हो जाता है गायब

किसी आसमानी बुलबुले की तरह..

और हम इस लोकतंत्र की सच्ची परंपरा का निर्वाह करते हैं,

एक जागरूक राष्ट्र के नागरिक के तौर पर,

बस इतना-सा फर्क है हुकूमत और हम में,

कि सियासत उस घटना के हो जाने पर उसकी निंदा करती है,

और हम केवल सियासत की आलोचना…

  • धीरू यादव
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