समाचार चैनल एबीपी न्यूज़ के अभिसार शर्मा ने फेसबुक लाइव के ज़रिए एक बार फिर देश में चल रहे गंभीर मसलों पर बात की जिसमें उन्होंने नोटबंदी और मौजूदा सरकार की बात की। उन्होंने फेसबुक लाइव का शीर्षक दिया ‘सत्ता पर आसीन बीजेपी के नेताओं में इतना घमंड और अकड़ क्यों है?’ उन्होंने बीजेपी नेताओं के घमंड को नोटबंदी को लेकर सरकार के रवैया से जोड़कर बात की।

अभिसार शर्मा ने कहा बीजेपी के तेवर में बला की दबंगई है उन्हें कुछ भी कहलो, कुछ भी करलो, कोई कुछ भी नहीं बिगाड़ सकता। ये भाव हर तरफ दिखाई देता है। हैरानी इस बात की है कि जनता में इसको लेकर कोई आक्रोश नहीं है। उन्होंने जोर देकर कहा कि बीजेपी अपनी शालीनता भूल गई है और योगी जी इस खोई हुई शालीनता का उदाहारण हैं जो उनके गोरखपुर वाले बयान से साफ झलकता है।

मनाहोरलाल खट्टर कहते है “मै इस्तीफा नहीं दूंगा जिसे मांगना है वो मांगता रहे”। सरकार पूरी तरह से फेल होने के बाद खट्टर का ऐसा बयान देना, यही बेकाबू तेवर है। जिसमे कोई सियासी शालीनता तक नहीं जिसमे इतनी हेकड़ी और घमंड है। क्या ऐसे हेकड़ी और घमंड को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और अमित शाह की शह मिल रही है? क्योकि राम रहीम को सजा मिलने के बाद साक्षी महाराज ने जो वाहियात बयान दिया था उसपर उनसे अभी तक जवाब-तलब नहीं किया गया है।

अभिसार ने बीजेपी नेताओं पर कटाक्ष किया कि बीजेपी की हालत इस समय मोहल्ले के उस आका (बदमाश) की तरह है जो किसी को भी छेड़ देता है, किसी को मार देता है, किसी का ठेला उखाड़ देता है। क्योकि कोतवाल बड़े भईया जो ठहरे। दरअसल, इस वक़्त सारा जोर बड़े भईया के करिश्मे पर है, लोगों को हिन्दू मुस्लिम के नाम पर बाँट दो, उनमे दो फाड़ कर दो इसके एवज़ में काम करो या न करो क्या फर्क पड़ता है।

अभिसार ने कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद का लिए इंटरव्यू का उल्लेख किया जिसमे उन्होंने मंत्री जी से सवाल किया था “ तीन तलाक पर सरकार के रुख से क्या आपको उम्मीद है की मुसलमान औरतें आपको समर्थन देंगी क्या ये आपका सियासी पैंतरा नहीं था?” इसपर रविशंकर ने बुलंद आवाज़ में जवाब दिया “हम देश के 70 फीसदी हिस्से पर राज़ कर रहे हैं, अब क्या एबीपी न्यूज़ बताएगा की हम सियासत करेंगे और हमें बताया जायेगा की कौन हमें वोट देगा।

अभिसार ने नोटबंदी पर बात करते हुए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के एक बयान का ज़िक्र करते हुए बताया कि पीएम बोलते थे वो पहले ज़माना था जब कहा जाता था कि कितना गया, अब आवाज़ उठ रही है कितना आया। लेकिन कितना आया वो जनता को पता चल गया है। सरकार का शुरुआत में मकसद था काला धन आतंकवाद और नक्सलवाद को नोटबंदी के ज़रिए ख़त्म करना। लेकिन क्या नोटबंदी के बाद नक्सलवाद आतंकवाद ख़त्म हो गया? जबकि नोटबंदी के बाद दो बड़े नक्सली हमले हुए हैं। कश्मीर में हिंसा और बढ़ रही है, सैनिकों के परिवार डर के माहौल में जी रहे हैं। क्या यही नोटबंदी का असर है? जबकि हक़ीकत ये है की सरकार पूरी तरह से नाकाम हुई है नोटबंदी में।

अभिसार ने अटोर्नी जर्नल मुकुल रोहतगी के एक बयान का हवाला देते हुए कहा जिसमे रोहतगी ने कहा था कि सरकार को उम्मीद थी कि नोटबंदी से 4 से 5 लाख करोड़ रूपया ख़त्म हो जायेगा जो नार्थ-ईस्ट और जम्मू कश्मीर में अराजकता फ़ैलाने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। असल में ज़मीनी हक़ीकत ये है कि नोटबंदी विफल है तभी नक्सली और आतंकवादी हमले लगातार हो रहे हैं।

मौजूदा सरकार नोटबंदी की नाकामी को छुपाने के लिए अपने मक़सद बदल रही है और जनता इतनी बेवकूफ है कि वो इस बहकावे में आ भी जाती है। पर जनता ये नहीं देख रही है कि नौकरियों के नाम पर सरकार से कुछ नहीं मिल रहा है, देश की अर्थव्यवस्था रसातल पर जा रही है। मगर जनता फिर भी खुश है। अभिसार ने ये भी कहा कि सरकार अपनी जिम्मेदारियों से भाग नहीं सकती क्योकि सवाल उसी से किया जाएगा जो सत्ता में होगा और सरकार किसी का मुँह नहीं पकड़ सकती।

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