1 जनवरी 1818 को ईस्ट इंडिया कंपनी की तरफ से पेशवाओं के खिलाफ लड़ने वाले महार रेजिमेंट को उनकी बहादुरी का इनाम मिला। भीमा नदी के किनारे बसे कोरेगांव में उन सैनिकों की याद में युद्ध स्मारक बनाया गया। अछूत समझे जाने वाले महारों को बराबरी से जीने का हक मिला।

पेशवाओं पर ईस्ट इंडिया कंपनी ने जीत हासिल कर ली थी, अब सवाल उठता है कि इसके बाद पेशवाओं का क्या हुआ? उनके साम्राज्य का क्या हुआ? क्या पेशवा ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा खत्म कर दिए गए? या फिर उन्हें गुलाम बना लिया गया?

इतिहास की इस घटना पर वरिष्ठ पत्रकार दिलीप मंडल ने प्रकाश डाला है। उन्होंने लिखा है कि ”भीमा कोरेगांव में हारने के बाद पेशवा बाजीराव द्वितीय ने सरेंडर ही नहीं किया, अंग्रेज बहादुर से 8 लाख रुपए की सालाना पेंशन (उस समय के हिसाब से ढेर सारी रकम) ली और उनके आदेश पर पुणे से दूर कानपुर के पास बिठुर में बस गए और वहीं अपनी ऐशगाह खोल ली।”

इतिहास के इसी हिस्से को थोड़ा विस्तार दिया है वरिष्ठ पत्रकार शंभूनाथ शुक्ला ने। शंभूनाथ पेशवा बाजीराव-2 के कुछ ऐसे किस्से बताते हैं जो पेशवाओं की हकीकत बयान करता है।

वो लिखते हैं कि एक जनवरी 1818 को पुणे के करीब भीमा तट पर कोरेगांव में पेशवा बालाजी (बाजीराव द्वितीय) की पराजय ने पूरे मराठा साम्राज्य के पतन की गाथा लिख दी। अष्टपदी मराठा साम्राज्य (होलकर, भोंसले, गायकवाड़, सिंधिया आदि) ने ईस्ट इंडिया कम्पनी के समक्ष हथियार डाल दिए।

उसी समय अंग्रेजों ने मराठा साम्राज्य के अभेद्य दुर्ग पुणे से पेशवा को बाहर किया और कानपुर के समीप बिठूर में 120 गांवों का रक़बा दिया। साथ में आठ लाख रूपये सालाना की पेंशन भी।

पेशवा जब बिठूर आए तो अपने साथ करीब डेढ़ सौ वर्षों के मराठा अधिपति की समृद्धि भी लाये। कहते हैं 36 हज़ार हाथियों में सोना लाया गया। ऊँटगाड़ियों और बहलियों में लदे हीरे-जवाहरात। मगर बालाजी का दुर्भाग्य कि वे पुत्रहीन थे। और कान के कच्चे भी थे। विलासिता में कतई कमी नहीं। हाथ खूब खुला था।

हज़ारों नौकर-चाकर और पुरोहित तथा भिक्षुक मराठा ब्राह्मण भी साथ आए। पैसा पानी की तरह बहाया गया। बाजीराव घाट से गंगा की एक पूरी धारा दूध की बहाई जाती। अंग्रेज हुक्कामों को डालियाँ भेजी जातीं। लखनऊ के नवाब का भी आना-जाना रहता।

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