इस नोटबंदी में पूरा देश प्रधानमंत्री के कालाधन,आतंकवाद व भ्रष्टाचार से छुटकारा पाने की मुहिम में सहयोग की वजह से बैंक व एटीएम की कतारों में खड़ा है। करीब इन 45 दिनों में 105 मौतें, परेशान किसान,बेहाल मजदूर और सब्र करता व्यापारी इसलिए खामोश है कि शायद एक मुहिम सदियों पुराने दीमक को खत्म कर दे।

लेकिन ऐसा होता न नामुकिन सा लगता है। क्योंकि कालधन माफिया व बड़े-बड़े देश की अर्थव्यवस्था को करोड़ो का चूना लगाने वाले तो सरकारी चंगुल से बाहर है।

पहले किंगफिशर कंपनी के विजय माल्या का करोड़ो की चपत लगाकर भाग जाना। जिसके बाद भी सरकार का 1200 करोड़ का उसका कर्जा माफ कर देना। यह सब बताता है कि सरकारें ही इनकी पोषक है।

उनमें से एक है मोदी सरकार। क्योंकि वर्तमान की मोदी सरकार की कथनी और करनी में फर्क नजर आता है। यह सरकार कहती कुछ है और करती कुछ और है। कालाधन खत्म करने की बात करती है।

जिसके लिए 125 करोड़ जनता को सड़क पर लाकर खड़ा कर देती है लेकिन करोड़ो की चपत लगाने वाले कब देश छोड़कर भाग जाते है उसका अता-पता इस सरकार को नहीं रहता है।

आर्म्स डीलर संजय भंडारी जिसपर कई जांच चल रही हैं। वह सरकारी सूत्रों के मुताबिक लंदन में है। 27 अप्रैल को आयकर विभाग ने छापे में भंडारी के घर से राबर्ट वाड्रा के साथ उसके ईमेल मिले थे। भंडारी पर उसकी तमाम कंपनियों के जरिए कर चोरी व एअरफोर्स के ट्रेनिंग एयरक्राफ्ट की 4000 की डील में शामिल होने के आरोप है।

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