न्यायपालिका में जातिवाद, सरकार-परस्ती और भाई-भतीजावाद के आरोप एक लंबे दौर से लगते आ रहे हैं। बीते वर्ष हाईकोर्ट में जज रहे जस्टिस कर्णन ने भी इसके खिलाफ आवाज उठाई थी मगर उनको नज़रबंद कर दिया गया, मामले को दबाने की कोशिश हुई।

अब जबकि सुप्रीम कोर्ट के चार न्यायधीश आकर देश की जनता से अपील कर रहे हैं कि लोकतंत्र को बचाया जाए, तब स्थिति ज्यादा चिंताजनक होती जा रही है। ऐसे गंभीर मामले में भी जातिगत समीकरणों की आशंका से निष्पक्षता की झलक नहीं मिल रही है।

जस्टिस लोया के मामले में मुख्य न्यायाधीश जस्टिस दीपक मिश्रा पर मनमानी का आरोप लगा है ,उनके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट के जजों ने जो बयान जारी किए, उसके बाद जज लोया संबंधित इस पूरे मामले को देखने के लिए जिस न्यायाधीश को नियुक्त किया गया है वह अरुण मिश्रा हैं। जिनके भाजपा से करीबी रिश्ते होने के चर्चे हमेशा से रहे हैं। वरिष्ठ वकील दुष्यंत दवे ने आरोप लगाया है कि अरुण मिश्रा पक्षपात करेंगे और उनका भाजपाई पक्षपात सही न्याय नहीं दिलाएगा।

पिछले 3 दिनों से जिस तरह का माहौल बना हुआ है और सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश पर इतनी व्यापक स्तर पर संदेह जताया जा रहा है, ऐसे में बार काउंसिल ऑफ इंडिया के अध्यक्ष मनन कुमार मिश्रा कहते हैं कि ‘ये मामला आंतरिक है’ और उसे सॉल्व कर लिया गया है।

जब सुप्रीम कोर्ट के चार वरिष्ठ न्यायाधीश साझा बयान जारी करते हैं और न्यायपालिका के इतिहास में पहली बार देश की जनता से अपील करते हैं कि जुडिशरी पर हो रहे लगातार हमले से बचाकर भारत के लोकतंत्र की रक्षा की जाए तो ऐसे समय में बार काउंसिल ऑफ इंडिया के मनन कुमार मिश्रा का कहना है की स्थिति ठीक है और सब कुछ आंतरिक मामला है!

क्या देश की न्यायपालिका में इस तरह का अविश्वास जजों का आंतरिक मामला हो सकता है ?

क्या सर्वोच्च न्यायालय में चल रहा इस तरह का खेल कुछ लोगों का आपसी मामला हो सकता है ?

कहीं अघोषित मिश्रा रिपब्लिक बना रहे इस गठजोड़ को इस देश की पूरी न्याय व्यवस्था ही आपसी मामला तो नहीं लगती ?

कम से कम इस मामले में जो हालात बन रहे हैं इसमें निष्पक्षता की उम्मीद नहीं की जा रही है। क्योंकि मामले की कमान जिसके हाथ में दी गई है उन अरुण मिश्रा को निष्पक्ष न्यायाधीश के रूप में नहीं देखा जा रहा है।

अगर इस मामले में यह बात साबित हो जाती है कि सरकार या भाजपा की तरफ से किसी तरह का दबाव डाला गया और वर्तमान सरकार में इसके जिम्मेदार लोगों के जांच की बात आएगी तब भी निष्पक्षता पर सवाल उठेंगे, क्योंकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मुख्य सेक्रेटरी नृपेंद्र मिश्रा हैं और आखिर जवाबदेही तय होने में अगर संसद तक बात जाएगी तो यह भी गौर करने की बात है कि लोकसभा के सेक्रेटरी जनरल अनूप मिश्रा हैं – इनको जातिवादी कह देना जल्दबाजी होगी मगर इनपर शक न किया जाय ऐसा भी भरोसा नहीं बनाया गया है।

हालांकि इन सबके बावजूद पूरे मामले की सही जांच हो सकती है, व्यवस्था में सुधार हो सकता है और किसी भी तरह से पक्षपात से बचा जा सकता है , बशर्ते इस आशंका को झुठलाया जा सके कि राजनीतिक और जातिगत गठजोड़ से न्यायपालिका में पक्षपात आया है।

Loading...
loading...