सुखराम के बाद अब स्वागत करिए मुकुल रॉय का..

हाल ही में अपने कुनबे के साथ बीजेपी में शामिल हुए सुखराम के भ्रष्टाचारी अतीत के बारे में पूछे जाने पर बीजेपी के मुखर और प्रखर प्रवक्ता सुधांशु त्रिवेदी ने कहा कि सुखराम के खिलाफ मामले बहुत पुराने हैं. शेर -शायरी और कविताओं में दिलचस्पी रखने वाले सुधांशु त्रिवेदी ने आगे कहा – ‘जो बीत गई, वह बात गई. कानून अपना काम करेगा.’ शिमला में दिल्ली के बीजेपी नेता का ये बयान मायने रखता है।

भ्रष्टाचार और भ्रष्टाचारी के लेकर बीजेपी के नजरिए को भी साफ करता है. भ्रष्टाचार का मामला अगर पुराना हो. मौसम अगर चुनावी हो. नेता अगर वोटजुटाऊ हो तो जो बीत गई सो बात गई कहकर उसे अपने घाट का पानी पीने के लिए बुलाया जा सकता है. भ्रष्टाचारी अगर वोटवैंक वाला हो तो उसके अतीत पर गंगाजल से पोछा मारकर अपने पाले मे लिया जा सकता है।

जो बीत गई सो बात गई वाले तर्क के साथ. कविता की ही अगली लाइन जोड़ दें तो कह सकते है ‘जो बीत गई सो बात गई, माना वो बेहद भ्रष्टाचारी था ( माना वो बेहद प्यारा था की जगह )’. दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी बीजेपी दरिया बन चुकी है तो दरियादिली दिखाने का अधिकार तो है ही. जो भी इस दरिया में आएगा, अपने आप पाक साफ हो जाएगा. गंगा नहाने से पाप धुलते हैं न. तो बीजेपी में आने से भी धुल सकते हैं।

अब मेरा एक सुझाव है. बीजेपी को ’जो बीत गई सो बात गई ‘वाली राष्टीय लिस्ट बनानी चाहिए. बीतने की एक मियाद तय कर दें. ऐलान कर दें कि गुनाह पाँच साल -सात साल या दस साल पुराना हो जाए तो उसे बीतने की श्रेणी में जाल दिया जाएगा. पार्टी को अपने नए विधान -संविधान में भी ‘जो बीत गई सो बात गई’ वाली कैटेगरी का जिक्र कर देना चाहिए।

पूरी पारदर्शिता के साथ. पार्टी में इंट्री के ख्वाहिशमंदों को भी पता रहेगा कि वो कब इस कैटेगरी के लिए एलिजिबल हो जाएंगे. फिर पार्टी ने न कोई सवाल पूछा जाएगा. न नेताओं को बचाव में नई कविता सुनानी पड़ेगी. फायदा ये होगा कि हर राज्य से बीजेपी को ऐसे प्रतापी जेल रिटर्न नेता मिल जाएँगे, जो चुनावी मौसम में शिद्दत से पार्टी की तूरही बजाएँगे।

ऐसे खेले -खाए -पीए -अघाए नेताओं को ‘जो बीत गई सो बात गई ‘ के नारे के साथ पार्टी में शामिल करने के कई फ़ायदे भी होंगे. मालदार आसामी के अंदर आने से पार्टी पर कम से उनके इलाक़े के ख़र्चे का लोड नहीं पड़ेगा. ठीक -ठाक वोट पड़ेगा, सो अलग. हर्रे लगे न फिटकिरी रंग चोखा आए. लोकसभा चुनाव में भी अब डेढ़ साल ही रह गया है।

लेखक- अजीत अंजुम (वरिष्ठ पत्रकार)

नोट- यह लेख अजीत अंजुम की फेसबुक वॉल से लिया गया है।

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