मोदी भक्ति के बाद अब योगी भक्ति का एक नया दौर शुरू हो गया है। जबकि देशभर में संस्थानों का भगवाकरण हो रहा है तो दशकों से कुंडली मारकर बैठे अंदर कुतर्की प्रशासकों के फरमान अब खुलकर सामने आने लगे हैं।

इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर दुबे ने छात्रों को इस बात पर नोटिस भेजा है और सख्त कार्यवाही की धमकी दी है कि उन्होंने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का पुतला जलाया था।

वह कहते हैं कि ‘योगी आदित्यनाथ जी एक पवित्र मंदिर के महंत भी हैं, उनका पुतला जलाया जाना न सिर्फ असंवैधानिक और अवैधानिक है बल्कि अधार्मिक, असमाजिक अनैतिक और विश्वविद्यालय परिसर के मूल्यों के खिलाफ है।’

व्यवस्था से नाराज किसी छात्र द्वारा उस राज्य के मुखिया का पुतला दहन बेहद आम बात है और हमेशा से एक लोकतांत्रिक समाज में ये होता रहा है। इसको धर्म विरोधी गतिविधि बताकर अपनी संप्रदायिक सोच का नमूना देने वाले प्रोफेसर दुबे ने अपनी संप्रदायिक नर्सरी की पहचान दे दी है।

खैर उनका यह कुतर्क उसी कड़ी में आता है जिसमें वो जज भी था जो अपनी रिटायरमेंट के दिन में खुलकर बोलता है कि मोरनी मोर के आंसू पीती है तो बच्चे पैदा होते हैं। संविधान और विधान की गारंटी लेने वाले प्रोफेसर दुबे को प्रोफेसर होने के लिए जिन जरूरी चीजों की आवश्यकता पड़ी होगी उसके लिए उनका दुबे होना ही काफी है।

दशकों तक ऐसे ही कुतर्कों को सैकड़ों छात्रों के दिमाग में भरा गया होगा, यह जानकर निराशा भी है। हालांकि ऐसी सोच और ऐसी समझ के लिए अकेले एक भाजपा सरकार को जिम्मेदार ठहरा देना मामले को छोटा कर देना होगा क्योंकि उनकी नियुक्ति का काल समझ में आता है कि ऐसे पक्षपाती और कुतार्कियों के लिए कांग्रेस के शासनकाल में भी खूब मौके रहे हैं।

आखिर योगी आदित्यनाथ सांप्रदायिक बयान वाले वही नेता हैं जिनको इलाहाबाद विश्वविद्यालय में आने से रोकने के लिए छात्र दिन-रात सड़कों पर धरना प्रदर्शन कर रहे थे। एबीवीपी की लाख गुंडई मारपीट और जबरदस्ती को सहने के बाद भी तत्कालीन छात्रसंघ अध्यक्ष रिचा सिंह की अगुवाई में छात्र छात्राओं ने अपना संघर्ष जारी रखा और योगी को शिक्षा के मंदिर में नफरत भरे लहजे में बोलने से रोककर दिखाया।

अब मोदी का चेहरा दिखाकर वोट लेकर योगी को अगर मुख्यमंत्री बना ही दिया गया है तो उनकी भी छवि का मसीहाकरण शुरू हो गया है । उनके भी भक्तों की एक ऐसी फौज खड़ी की जा रही है जिसमें अनपढ़ से लेकर प्रोफेसर दुबे जैसे पढ़े-लिखे अध्यापक भी शामिल हैं। जिनको इस सांप्रदायिक राजनेता के विरोध मात्र में किसी भगवान की आलोचना जैसा संदेह होता है तभी तो विरोध भी धर्मविरोधी लगने लगता है।

एनडीटीवी की एक रिपोर्ट के अनुसार, इस मामले पर छात्रों से बात करने पर पूर्व छात्रसंघ अध्यक्ष रिचा सिंह कहती हैं ‘ सीधी सी बात है, नाराज छात्रों द्वारा अपने राज्य के मुख्यमंत्री का पुतला दहन हुआ है। इसमें धर्मों की बात लाकर भाजपा अपनी सांप्रदायिक राजनीति कर रही है और उसी की बोली इलाहाबाद विश्वविद्यालय का ये प्रशासन भी बोल रहा है।’

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