गुजरातियों का चुनावी मिजाज जानने के लिए हम लगातार जिला दर जिला भटक रहे थे। जो बात सबसे ज्यादा बुरी लग रही थी वो ये कि कोई भी जल्दी चुनाव को लेकर बात करने को तैयार नहीं हो रहा था। ज्यादतर लोग बात छिपाने की कोशिश कर रहे थें लेकिन जिन्होंने बोलने की हिम्मत जुटाई वो बहुत कुछ बता गए।

पालनपुर रेलवे स्टेशन से निकल वडगाम जाने के लिए ऑटो रिक्शा की तलाश शुरू हुई। गोविंदभाई (रिक्शा चालक) कनोदर तक चलने को तैयार हो गए। गोविंदभाई पालनपुर के ही रहने वाले थे। बातचीत शुरू हुई तो पता चला कि उनकी शादी हो गई है और दो बच्चे भी हैं। गोविंदभाई के दोनों बच्चे सरकारी स्कूल में पढ़ते हैं जिसकी वजह से वे उनके भविष्य को लेकर चिंतित थे।

उनका कहना था ”मेरे बच्चे दूसरी और तीसरी कक्षा में पढ़ते हैं। यहां सरकारी स्कूल में बिल्कुल भी पढ़ाई नहीं होती। बच्चे कभी भी स्कूल में जाते हैं और कभी भी वापस आ जाते हैं। मैं अब अपने बच्चों को सरकारी स्कूल में नहीं पढाऊंगा।”

गोविंद भाई ने आगे कहा कि ”बच्चों के लिए कोई स्कूल ड्रेस नहीं है। एक ही क्लास में कई कक्षा के बच्चे पढ़ते हैं। शिक्षक पढ़ाने की कोशिश करते हैं लेकिन संसाधन ही कमी के आगे वो भी मजबूर हैं।”

पिछले कई महीनों से तमाम रिपोर्ट्स में जिसका जिक्र था वो गुजरात की जमीनी हकीकत निकली। गोविंदभाई अपने बच्चों को प्राइवेट स्कूल भेजना चाहते हैं।

दिमाग में सवाल दौड़ पड़ा कि, जो रिक्शा चालक अपने बच्चों को प्राइवेट स्कूल में पढ़ाने की बात कह रहा है उसकी मासिक कमाई कितनी होगी?

गोविंद भाई के मुताबिक वो महीने में लगभग 6000 रुपए कमा लेते हैं और प्राइवेट स्कूल एक बच्चे का मासिक शुल्क 1000 रुपए लेता है। यानी दो बच्चों का 2000 रुपए। बचे 4000 रुपए से उन्हें खाने-पीने और रहने का इंतजाम करना है।

बता दें कि कई रिपोर्ट्स में ये दावा किया जा रहा है कि, गुजरात में 17 हजार सरकारी स्कूल बंद हो गए है और 45 हजार नए प्राइवेट स्कूल खोले गए हैं। देश के 29 राज्यों की लिस्ट में सरकारी शिक्षा पर खर्च करने में गुजरात 26वें स्थान पर है। खैर इन आकड़ों की चक्की में हम गोविंदभाई के भावनाओं को नहीं पीसना चाहते।

जब हमने बड़े ही अपनेपन अंदाज में उनसे नोटबंदी और जीएसटी पर राय जाननी चाही तो उन्होंने बताया कि ”जीएसटी के बारे में तो मुझे पता नहीं लेकिन नोटबंदी ने बहुत नुकसान पहुंचाया। जो भी जमा पूंजी घर पर इकठ्ठा की थी सब बर्बाद हो गई ।”

हमने पूछा कि आपने अपने रुपए बैंक में क्यों नहीं जमा करा दिए? तो गोविंद भाई का जवाब था कि ”लाइन इतनी लंबी होती थी कि हिम्मत नहीं हुई, रोज नियम बदल रहे थे, कुछ पता ही नहीं चल रहा था क्या हो रहा है। हम रोज कमाने खाने वाले लोग है, एक दिन नहीं कमाएंगे तो रोटी नसीब नहीं होगी”

इसके बाद तो गोविंदभाई बोलते ही चले गए। फ्लाईओवर पर चढ़ते हुए उन्होंने कहना शुरु किया कि ”इस सरकार ने यहां विकास के नाम पर सिर्फ सड़के ही बनवाई हैं। मैं हमेशा भाजपा को वोट देता था लेकिन इसबार कांग्रेस को दूंगा। सब कह भी रहे हैं कांग्रेस जीत रही है।”

गोविंदभाई और बातें बता ही रहे थें तब तक हम कनोदर पहुंच गए। ऑटो से उतरते हुए मैने पूछा कि यहां कुड़ा कचड़ा बहुत फैला हुआ है, मोदी जी ने यहां स्वच्छ भारत नहीं चलाया क्या?

गोंविंदभाई ने हंसते हुए कहा अरे बाबा सब ड्रामा है। अब कचरा लेने वाला कोई नहीं आएगा तो लोग रोड पर ही फेकेंगे न। लेकिन मैं रोड पर नहीं फेंकता रोज इक्ट्ठा कर के जला देता हूं।”

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