यह लेख उन प्रश्नों के संदर्भ में लिखा गया है जिसमें लेखक से पूछा गया था कि वह ‘स्वदेशी जागरण मंच’ का हिस्सा क्यों नहीं बनना चाहता।

मित्र! जिस फोन से मैं यह लेख टाइप कर रहा हूं, ‘दुर्भाग्य’ से वो भी चायना का है। और तो और मुझे बिल्कुल नहीं पता कि मेरे घर में इस्तेमाल हो रहा कौन सा सामान चीन का नहीं है। लिहाजा, नैतिकरूप से मैं आपकी ‘चीनी वस्तुओं के बहिष्कार अभियान’ का हिस्सा बनने के योग्य नहीं हूं। दरअसल, मैं चाहता भी नहीं कि मेरे कारण आपकी इस मुहिम की ‘आत्मा’ दूषित हो। उम्मीद है कि ‘स्वदेशी जागरण मंच’ का कोई भी सदस्य किसी भी विदेशी वस्तु का इस्तेमाल नहीं करता होगा, खासकर चायनीज वस्तुओं का।

भ्रमित राष्ट्रवाद

हालांकि, ऐसा नहीं कि मजदूरों और देश की सुरक्षा मैं नहीं चाहता, लेकिन इसके लिए आपका चीनी वस्तुओं के बहिष्कार का तर्क मेरी निगाह में भ्रमित राष्ट्रवाद और कोरी भावुकता से प्रेरित है, न कि तथ्यों पर आधारित।

आंकड़ों के मुताबिक, 2009-2010 में 8 लाख 70 हजार नए लोगों को रोजगार मिला था, वहीं 2016 में सिर्फ 1 लाख 35 हजार नए रोजगार पैदा हुए। माफ कीजिए, जैसा कि आप बताते हैं इसका जिम्मेदार चीन नहीं बल्कि हमारी पूज्य सरकार है।

दोषी बचाओ मुहिम

मेरी राय में अगर बहिष्कार करना ही है तो आपके इस ‘स्वदेशी जागरण मंच’ का ही क्यों न किया जाए, जो कारीगरों-मजदूरों की दशा के लिए सरकारी अनदेखी और उसकी गलाघोंटू नीतियों को जिम्मेदार ठहराने की बजाए, चीनियों को जिम्मेदार ठहराकर असल दोषियों को बचाने में लगा है।

मेड इन इंडिया

25 अक्तूबर 2015 को बीबीसी ने एक रिपोर्ट प्रकाशित

की। शिल्पा कन्नन की इस रिपोर्ट का शीर्षक था, ‘अब चीनी सामान भी मेड इन इंडिया।’ रिपोर्ट के अनुसार, ‘चीन से आने वाले खिलौने और अन्य इलेक्ट्रॉनिक उपकरण अब भारत में ही बनने लगे हैं। इसकी शुरुआत खुद चीनी कंपनियों ने की है। आंध्रा प्रदेश के ग्रामीण इलाकों में स्थित ये कंपनियां अमेरिका को निर्यात करने के लिए भी सामान बना रही हैं।’ ध्यान दीजिए, ये कंपनियां ग्रामीण इलाकों में स्थापित की गईं हैं यानी लोगों को रोजगार के लिए पलायन करना नहीं पड़ा। रिपोर्ट आगे कहती है कि ऐसी छोटी-बड़ी 100 कंपनियां हैं, जिनसे करीब दो लाख नौजवानों को रोजगार मिला है।

दांवों की चगुली

प्रिय, स्वदेशी जागरण मंच! क्या आप इन नौजवानों को भी ‘शत्रु’ मानते हैं या चीनियों संग काम करने के लिए इन्हें पथभ्रष्ट माना जाए। चूंकि इनके बनाए सामान का मुनाफा ‘शत्रु’ मुल्क को भी होता है, अलबत्ता मेरी राय में आप एक मुहिम इन नौजवानों के खिलाफ भी बुलंद कीजिए।

सुषमा जी हमारे विकास में उसी चीन के योगदान का जिक्र करती हैं, जिसके व्यापार का आप भारत में गला घोंटने की वकालत करते हैं, ताकि वह घुटने टेक दे। हालांकि आंकड़े ‘चीन को घुटने पर लाने के’ आपके दावों की चुगली करते हैं।

फर्क नहीं पड़ने वाला

जेएनयू में सेंटर फॉर चाइनीज स्टडीज सेंटर के प्रोफेसर बीआर दीपक के मुताबिक, ‘चीन की अर्थव्यवस्था का आकार 11.5 ट्रिलियन डॉलर का है। अमरीका और जापान के साथ चीन का सालाना व्यापार क्रमशः 429 और 300 बिलियन डॉलर का है, जबकि भारत के साथ महज 70 बिलियन डॉलर। ऐसे में अगर भारत का हिस्सा निकल भी जाए तो चीन को खास फर्क नहीं पड़ने वाला।

चायना युद्ध

आप 1962 के युद्ध का जिक्र करते हैं और उसका जिम्मेदार नेहरू को बताते हैं। मानता हूं, पर नेहरू में यह साहस भी था कि उन्होंने अपनी ‘गलती’ मानी। हालांकि, उस युद्ध एक बड़ा कारण भारत का दलाई लामा को शरण देना भी था। इतिहासकार रामचंद्र गुहा की बेहद महत्वपूर्ण किताब ‘इंडिया आफ्टर गांधी’ आप देख सकते हैं।

कूटनीति ही रास्ता

दरअसल आपकी ‘चीनी वस्तुओं के बहिष्कार की मुहिम’ गरीबों पर चाबुक है क्योंकि इसका सबसे बड़ा उपभोक्ता वह तबका है जो महंगे सामान नहीं खरीद सकता। रही बात डोकलाम जैसे विवादों की तो उसका समाधान कूटनीतिक तरीके के निकलेगा न कि आपके इस अतिवादी राष्ट्रवाद से। गौरतलब है कि पिछले दिनों डोकलाम से चीनी सैनिक इसलिए वापस नहीं लौटे क्योंकि आपने उनकी झालरें, खिलौने और मूर्तियां खरीदनी बंद कर दी थीं बल्कि इसलिए लौटे क्योंकि हमारी कूटनीति पहले के मुकाबले अधिक बेहतर थी।

-प्रियांशु

 

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