ऐ मुहब्बत तेरे अनजाम पे रोना आया..जाने क्यों आज तेरे नाम पे रोना आया.. लाखों दिलों पर अपनी गजल का जादू चलाने वाली और मल्लिका-ए-गजल के तौर पर पहचाने जानी वाली मशहूर गायिका बेगम अख्तर का आज (7 अक्टूबर) 103वां जन्मदिवस है।  बेगम अख्तर के जन्मदिन पर गूगल ने उनका डूडल बनाकर उन्हें श्रद्धांजलि दी है। गूगल ने उनके जन्मदिन पर सितार बजाते हुए और उनके आस-पास बैठे लोगों को उनके संगीत को सुनते हुए दिखाया है।

1914 में जन्मी बेगम अख्तर फैजाबाद के शादीशुदा वकील असगर हुसैन और तवायफ मुश्तरीबाई की बेटी थीं। बताया जाता है कि मुश्तरीबाई को जुड़वा बेटियां पैदा हुई थीं लेकिन किसी कारणवंश उनकी बड़ी बेटी का देहांत हो गया था। कुछ समय बाद असगर हुसैन ने भी मुश्तरी और बेटी बेगम को छोड़ दिया था जिसके बाद दोनों मां-बेटी को अकेले ही संघर्ष करना पड़ा।

बेगम अख्तर ने मामूली पढ़ाई के बावजूद उर्दू शायरी की अच्छी जानकारी हासिल कर ली थी। उन्होंने सात साल की उम्र से गाना शुरू कर दिया था। लेकिन उनकी मां मुश्तरी इसके लिए राजी नहीं थीं। वहीं उनकी तालीम का सफर शुरू हो चुका था। बेगम अख्तर ने कई उस्तादों से संगीत की शिक्षा ली थी।

13 साल की उम्र में बेगम, अख्तरी बाई हो गई थीं। बेगम अख्तर दादरा और ठुमरी की साम्राज्ञी हैं। 7 साल की उम्र में मौसिकी की तालीम लेनी शुरू की थी वहीं 15 साल की उम्र में पहली बार अख्तरी बाई फैजाबादी के नाम पर मंच पर उतरी और पब्लिक परफॉर्मेंस दी। बेगम अख्तर ने 400 गीतों को अपनी आवाज दी है।

बेगम अख्तर ने जल्द ही लोगों के बीच अपनी पहचान बना ली थी। मेहफिलों में लोगों के बीच बेगम अख्तर काफी मशहूर हो गई थी। छोटी सी ही उम्र में उनके लिए अभिनय के दरवाजे खुल गए। उन्होंने वर्ष 1920 में कोलकाला के एक थियेटर से एक्टिंग करियर की शुरुआत की।

कहा जाता है अख्तरी बाई को अकेलेपन से बहुत डर लगता था। वह अपने अकेलेपन को दूर करने के लिए शराब और सिगरेट का सहारा लेती थी। उनको सिगरेट की तलब इतनी ज्यादा हो चली थी कि वह एक चेन स्मोकर बन गई थी। सिगरेट के कारण ही बेगम अख्तर ने ‘पाकीज़ा’ फिल्म छह बार देखी थी क्योंकि उनको सिगरेट पीने के लिए बार-बार थियेटर के बाहर जाना पड़ता था।

बेगम अख्तर ने 1945 में परिवार के खिलाफ जाकर बैरिस्टर इश्तियाक अहमद अब्बासी शादी कर ली। शादी के बाद से उनका नाम बेगम अख्तर पड़ गया। कहा जाता है कि उन्होंने पति के कहने पर गाना छोड़ दिया था। गाना ना पाने के चलते वह गुमसुम रहने लगी, इसीलिए वे बीमार रहने लगीं। सिगरेट बहुत पीती थीं इसलिए उन्हें फेफड़े की बीमारी के साथ ही डिप्रेशन की परेशानी हो गई।

बताया जाता है कि बच्चा ना होने के कारण वो बहुत दुखी रहने लगी थीं। तब डॉक्टरों ने कहा कि उनकी बीमारी गाने से ठीक हो सकती है। तब पति की हां के बाद 1949 में वे ऑल इंडिया रेडियो लखनऊ से जुड़कर गायन की दुनिया में वापस आ गईं।

बेगम अख्तर को भारत सरकार ने पद्मश्री और पद्मभूषण से सम्मानित कर चुकी है। उन्हें संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार भी प्राप्त हुआ है। 30 अक्तूबर 1974 को बेगम अख्तर ने आखिरी सांस ली उनकी निधन हार्ट अटैक से हुआ था। लखनऊ के बसंत बाग में उनकी मां मुश्तरी बाई की कब्र के बगल में उनकी क्रब को बनाया गया।

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