खुद को राष्ट्रवादी पार्टी बताने वाली भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) का राष्ट्रवाद त्रिपुरा में कमजोर पड़ गया। इसका कारण है राजनीतिक महात्वकांक्षा। बीजेपी अपनी राजनीतिक महत्वकांक्षा को पूरा करने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार रहती है।

समय-समय पर अखंड भारत का सपना दिखाने वाली बीजेपी राष्ट्रवादी नहीं अवसरवादी है। वो राजनीतिक संगठन जो देश को तोड़ने की मांग करते रहे हैं आज बीजेपी उनके साथ मिलकर सरकार चला रही है।

बीजेपी दो राज्यों में अलगावादियों का समर्थन करने वाली पार्टियों के साथ मिलकर सरकार चला रही है। पहला राज्य है जम्मू कश्मीर जहां बीजेपी PDP के साथ मिलकर महबूबा मुफ्ती के नेतृत्व में सरकार चला रही है। PDP हमेशा से अलगावादियों के लिए सॉफ्ट कार्नर रखती है और अप्रत्यक्ष रूप से समर्थन भी करती है।

इसी तरह अब बीजेपी त्रिपुरा में भी अलगाववादी संगठन IPFT के साथ मिलकर सरकार चलाने वाली है। त्रिपुरा में कुल 60 विधानसभा सीट है, जिसमें से 51 पर बीजेपी ने चुनाव लड़ा और नौ पर उसकी सहयोगी पार्टी IPFT ने चुनाव लड़ा। बीजेपी 51 में से 35 जीत गई, वही IPFT ने नौ में से आठ सीटों पर जीत दर्ज की है।

चुनाव परिणाम आने के बाद बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने अपने भाषण में भी कहा कि वो अपनी सहयोगी पार्टी IPFT को सरकार में जगह देंगे। बता दें कि IPFT का इतिहास रक्तरंजित रहा है। IPFT टिप्परलैंड नाम के अलग राज्य की मांग करती रही है। इस संगठन को सशस्त्र राष्ट्रीय लिबरेशन फ्रंट ऑफ त्रिपुरा (एनएलएफटी) का भी समर्थन प्राप्त रहा है।

एक तरफ RSS-BJP देश के नागरिकों को अखंड भारत का सपना दिखाती है, और दुसरी तरफ अलग अपने लिए राज्य की मांग करने IPFT से गठबंधन करती है। ऐसे में क्या बीजेपी अपने समर्थकों के साथ धोखा नहीं कर रही?

बिल्कुल कर रही है। क्योंकि सोशल मीडिया से लेकर सड़को तक RSS-BJP समर्थक अखंड भारत का दम भरते हैं और उनकी पार्टी बीजेपी अलगाववादियों के साथ मिलकर सरकार चला रही है।

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