किसी सामाजिक सुधार के लिए कामयाब आंदोलन का श्रेय स्त्री के हिस्से जाए, यह कोई मर्दाना व्यवस्था कैसे बर्दाश्त कर सकती थी..!

ज्यादा वक्त नहीं बीता है, जब एक साथ तीन तलाक के खिलाफ मुसलिम समाज के भीतर ही महिला संगठनों की ओर से पर्याप्त प्रतिरोध खड़ा हो चुका था और वह कामयाबी के मुकाम पर पहुंचने ही वाला था। लेकिन संघियों-भाजपाइयों को यह बर्दाश्त नहीं हो सकता था कि वह औसत हिंदू समाज में यह संदेश फैलने दे कि मुसलिम समाज ने अपने स्तर पर किसी रूढ़ि या नाइंसाफी की रिवायत को खत्म किया!

वह भी मुसलिम महिलाओं के प्रतिरोध और आंदोलन के बूते कोई बड़ा बदलाव संभव हुआ, यह संदेश कैसे इस पुरुष व्यवस्था और समाज को बर्दाश्त होता! इसलिए मुसलिम महिला संगठनों की ओर से खड़ी हुई लड़ाई के मुकाम के करीब पहुंचने के पहले उनसे यह लड़ाई छीन ली गई,

उसे राजनीति का मसला बनाया गया और हिंदुओं के बीच यह संदेश फैलाया गया कि मुसलमान खुद में सुधार नहीं कर सकते, उन्हें कानून के डंडे से ही सुधारा जा सकता है। जबकि तीन तलाक पहले ही आम नहीं था और मुसलिम समाज के ही कई हिस्सों में बतौर रिवायत शायद ही चलन था।

असल खेल तीन तलाक पर कानूनी रोक के जरिए औसत हिंदू मानस में यह बात गहरे बैठाना है कि मुसलमान किसी भी सामाजिक सुधार के विरोधी होते हैं। इस तरह एक औसत हिंदू मुसलमानों के बरक्स हो जाता है, उनके साथ या बराबर नहीं। एक साथ तीन तलाक जिस रूप में प्रचारित रहा है, वह खत्म हो, इससे अच्छा क्या होगा!

यों, किसी भी सामाजिक रूढ़ि के खिलाफ प्रतिरोध ऐर दबाव अगर खुद उस समाज के भीतर से पैदा होता है तो उससे हुआ बदलाव अपने असर और अमल में ज्यादा ठोस होता है। कोई भी परंपरावाद और धार्मिकता की राजनीति से जिंदगी पाने वाली पार्टी इसे संभव नहीं होने दे सकती!

(इस बहाने सारे बेहद अहम मुद्दों को डायनासोर खा गया, यह कोई नहीं सोचेगा!)

ये लेख अरविन्द शेष के फेसबुक पेज से लिया गया है

Loading...
loading...