अब इसे चापलूसी की पराकाष्ठा कहा जाए या अपने नेता के प्रति श्रद्धा कि उसकी तुलना राष्ट्रपिता महात्मा गांधी से कर दी जाए। ताजा मामला केंद्रीय मंत्री महेश शर्मा का है जिन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तुलना महात्मा गांधी से कर डाली है।

भाजपा नेता और केंद्रीय संस्कृति मंत्री शर्मा ने गांधी जी के ‘नमक सत्याग्रह’ पर वाईपी आनंद की एक किताब के विमोचन कार्यक्रम में बोलते हुए कहा, ‘सौभाग्य से आज हमारे बीच प्रधानमंत्री के रूप में एक और गांधी मौजूद हैं, जो हमें प्रेरणा प्रदान करने वाले हैं।

शर्मा ने कहा कि स्वतंत्रता की आभा देश के प्रत्येक व्यक्ति तक पहुंचाने के वादे के साथ शुरूआत करने वाले प्रधानमंत्री का सपना गांधीजी के सपनों को पूरा करना है।

यह पहली बार नहीं है जब राष्ट्रपिता महात्मा गांधी से मोदी की तुलना की गई है। इससे पहले बीते जनवरी में खादी एवं ग्रामोद्योग आयोग (केवीआईसी) के कैलेंडर पर चरखा चलाते हुए प्रधानमंत्री मोदी की तस्वीर छपी थी। जिसपर काफ़ी विवाद हुआ था। इससे पहले वर्ष 2015 में विजय गोयल ने मोदी की तुलना गांधीजी से की थी। गोयल ने दिल्ली में जगह-जगह कई पोस्टर लगवाए थे जिनमें गांधीजी और मोदी दोनों को ‘साबरमती का संत’ कहा गया था।

खुद प्रधानमंत्री मोदी भी गांधी के नाम का इस्तेमाल कई बार कर चुके हैं। हाल ही में उन्होंने गौ रक्षकों द्वारा की जा रही हिंसा पर कहा था कि उन्हें गांधी और बिनोबा भावे से सीखना चाहिए। मोदी ने कहा था कि गोभक्ति के नाम पर हत्याएं स्वीकार्य नहीं हैं। इससे महात्मा गांधी सहमत नहीं होते।

अब सवाल उठता है कि आखिर क्यों भाजपा और संघ नेताओं को अचानक से गांधीजी इतने क्यों अच्छे लगने लगे। आरएसएस-भाजपा और गांधी जी की विचारधारा में कहीं कोई मेल नहीं है। संघ के लोग तो गांधी जी के नाम से ही बिदक जाते हैं। तो फिर क्यों आखिर भाजपा को गांधीजी याद आ रहे हैं।

मोदी सरकार के सत्ता में आने के साथ ही, गांधीजी के नाम का इस तरह इस्तेमाल हो रहा है जिससे आरएसएस को फायदा हो। सबसे पहले, गांधी जयंती 2 अक्टूबर से ‘स्वच्छता अभियान’ कार्यक्रम की शुरूआत की गई। उसके बाद दावा किया गया कि गांधीजी का हत्यारा नाथूराम गोडसे आरएसएस से नहीं था।

दरअसल अब गांधीजी का नाम और छवि का इस्तेमाल कर यह साबित करने की कोशिश की जा रही है कि आरएसएस-भाजपा अच्छे संगठन हैं। लेकिन तथ्यों के आगे ये दावे खोखले प्रतीत होते हैं। यह सबको पता है कि संघ, गांधीजी की राजनीति और उनकी विचारधारा का घोर विरोधी रहा है। संघ, गांधीजी के असहयोग आंदोलन का भी कटु आलोचक था। आरएसएस संस्थापक, गांधीजी के हिंदू-मुस्लिम एकता के प्रयास से भी सहमत नहीं थे।

यहां सवाल उठता है कि खुद गांधीजी संघ को किस नजर से देखते थे। शुरुआत में आरएसएस लंबे समय तक गुप्त रूप से काम करता रहा था। संघ, राष्ट्रीय आंदोलन में भी शामिल नहीं था। ‘हरिजन’ के 9 अगस्त 1942 के अंक में गांधीजी ने लिखा है, ‘मैंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की गतिविधियों के बारे में सुना है। मैं यह जानता हूं कि यह एक सांप्रदायिक संगठन है’। संघ के संबंध में गांधीजी के विचारों का सबसे विश्वसनीय स्त्रोत उनके सचिव प्यारेलाल द्वारा वर्णित एक घटना है। अपनी ‘पुस्तक महात्मा गांधी: द लास्ट फेज’ में प्यारेलाल लिखते हैं, संघ के राहत शिविरों में सेवा और कल्याणकारी कार्यों की तारीफ पर गांधीजी ने कहा था कि यह न भूलो कि हिटलर के नाजियों और मुसोलिनी के फासीवादियों में भी यही गुण थे। गांधीजी आरएसएस को तानाशाहीपूर्ण सोच वाला एक सांप्रदायिक संगठन मानते थे।

दरअसल 2014 में सत्ता में आने के बाद से ही आरएसएस, स्वाधीनता आंदोलन के इतिहास से स्वयं को जोड़ने के लिए बेचैन है। सच्चाई यह है कि आज आरएसएस गांधीजी का नाम लेकर प्रमाणपत्र हासिल करना चाहता है। संघ परिवार और भाजपा चाहे जितने दावे कर ले, लेकिन तथ्यों पर आधारित सच्चाई यही है कि गांधीजी कभी भी आरएसएस के प्रशंसक नहीं रहे।

 

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