जातिवाद के खिलाफ आग इधर उधर फ़ैल रही है। विषमता के खिलाफ विद्रोह होना तय है। आज कोई ऐसा बौद्धिक कोना नहीं है जहाँ वेमुला पर चर्चा नहीं हो रही हो? भटकाने, बहलाने से अब बात नहीं होगी। स्वर्ग-मोक्ष, तीज-तावीज जैसी ठग-बुद्धि पर विराम लगना तय है। एक साथ कई सवाल सुलग उठे हैं। सवाल दर सवाल का जबाव तो अब चाहिए ही। जैसा चल रहा है वह अब नहीं चलेगा।
यह नेतृत्व पाखंडी प्रतिक्रान्तिकारी के हाथों न हो। रुद्राक्ष, कंठीमाला, उंगली में पत्थर लटकाने वाले, भगवती-जागरण करने वाले किसी भाग्यवादी नेता और नेतृत्व के भरोसे भारत नहीं बचेगा।

देवताओं को मरना होगा। देवता-बाजार पर हमला करना होगा। कथावाचकों को मनरेगा से जोड़ना होगा। ताकि श्रम से जुड़ सके। कुंडली बेचने के बजाय ये कद्दू और करेला बेच सके। अंधविश्वास फ़ैलाने की छूट कैसे किसी को दी जा सकती है? वक्त है हल्ला-बोल करने का। साथियो ! यह सही समय है प्रहार करने का। वहस किसी की मौत पर नहीं, मार्किट और मनुवाद पर हो। वर्णाश्रम पर हो। मूत्र-मार्ग से ही पैदा होने वाला कोई मनु और महार कैसे ? इस पर बात आगे बढे। जन्मना सभी आदमी हैं, शुद्र और सवर्ण क्या ? ब्रह्मणिकल-आर्डर पर बवंडर हो। चाहे परिस्थिति कितना भी प्रतिकूल क्यों ना हो।

पूंजी और पूजा का चरित्र एक है। मनुवाद और मार्किटज्म एक है। वेमुला की मौत और न्याय में हमें फंसाया जा सकता है ताकि असली वहस को मारा जा सकता है। वेमुला की मौत ब्राह्मणवाद की मौत कैसे बने, हमें इन्ही लक्ष्यों पर केंद्रित रहना होगा।
इन बहेलियों के जाल से अपने को और समाज को बचाना जरूरी है।

इनके पास बहुत औजार हैं। पैसा, पद और पुरस्कार हैं। इनकी वलिवेदी पर कोई भी रामविलास और रामराज जैसे रामनामी नेता कभी भी चढ़ सकते हैं। इन खतरों का अहसास इस तंत्र को हो चुका है।

पीएम भावुक होते हैं, रोते हैं। आज आरक्षण जारी रखने का शंखनाद भी कर रहे है। हर तुक्के इस तूफ़ान को रोकने में लग रहे हैं।
संघ को पता है कि किसी सुषमा से ‘स्वराज’ जो अबतक ‘सवर्णराज’ ही रहा है, नहीं आएगा। किसी निरर्थक जुमलेबाजी से ‘संघसत्ता’ नहीं बचेगी। सुषमा नई बास्कोडिगामा बन वेमुला की जाति खोज क्यों कर रही है? यह सबको पता है। वाहियात उपादानों के उपयोग का अभ्यासी रही सुषमा।

इस जाति-प्रमाणपत्र को लेकर क्या होगा ? जन्म से लेकर मृत्यु तक जाति-कर अदा करने वाले लोगों की जाति खोजना क्या अब भी जरूरी है?
देश दलितों को सौपने के पूर्व इसकी नीलामी कर दी जायेगी। हजारों वर्षों से यही नीलामी का इतिहास है मेरे पास। संभव कुछ भी है। आरक्षण के बाद निजीकरण का खेल आया। ना बांस ना ही बाजेगी बांसूरी। दलित- राष्ट्र बनने के पूर्व यह कोई राष्ट्र ही नहीं बच पायेगा।
साजिश गहरी है। सावधान और सजग रहकर संघर्ष की स्थिति है।

लेखक- बाबा विजयेंद्र (सम्पादक स्वराज खबर)

Loading...
loading...