भीमा-कोरेगांव में हो रहे जातीय हिंसा को लेकर मीडिया का रवैया शर्मनाक है। मनुवादी मीडिया कोरेगांव की लड़ाई में ईस्ट इंडिया की तरफ से लड़ने वाले महारों (दलितों) को देशद्रोही साबित करने में लगा है। ये लड़ाई 1818 में हुई थी जब किसी भी अखंड देश का नाम भारत नहीं था, सिर्फ रियासतें ही रियासतें थीं।

जब देश ही नहीं था तो देशद्रोह कैसा? मनुवादी मीडिया लिख रहा कि दलित 200 सालों से अंग्रेजों की जीत का जश्न मनाते आ रहे हैं जबकि ये ऐसा नहीं है। महार रेजिमेंट ने अंग्रेजों की जीत के लिए नहीं बल्कि ब्राह्मणवादी पेशवाओं के अत्याचार से आजादी के लिए लड़ा था। ब्राह्मणवादी पेशवा महारों को अछूत समझते थें और उनके साथ जानवरों से भी बद्तर व्यवहार करते थे।

और जहां तक अंग्रेजों के साथ मिलकर लड़ने की बात है तो इतिहास को ठीक से याद किया जाना चाहिए कि कौन-कौन जातियां अंग्रेजों की सेना में प्रमुखता से थीं!

इस मामले पर प्रकाश डालते हुए वरिष्ठ पत्रकार दिलीप मंडल लिखते हैं कि ”मंगल पांडे किसकी फौज में था और चर्बी वाले कारतूस के कारण उसका धर्म खतरे में न पड़ता, तो उसकी बंदूक की गोलियां किनका सीना छलनी कर रही होती? चर्बी कांड से पहले तक मंगल पांडे ने किनका वध किया था?

क्रांतिकारी मातादीन ने विद्रोह की चेतना न पैदा की होती तो मंगल पांडे की बंदूक 1857 में किस ओर से चल रही होती?

वैसे भी अंग्रेजों के शासन के कुछेक साल को छोड़ दें तो अछूतों की ब्रिटिश फौज में एंट्री नहीं थी। बाकी फौजी उनके साथ खाने, उन्हें छूने और उनके साथ मिलकर लड़ने को तैयार नहीं थे। बाबा साहेब ने बाकायदा इसके खिलाफ पिटिशन दाखिल किया था।

भारत को गुलाम बनाने में अंग्रेजों का साथ किन जाति के सिपाहियों ने ज्यादा दिया? इसलिए बेहतर होगा कि इतिहास को ज्यादा मत कुरेदिए। नीचे आग है। हाथ जल जाएंगे।

अंग्रेजों की सेना में सबसे ज्यादा सैनिक सवर्ण जातियों के ही थें। आजादी से पहले सबसे ज्यादा अंग्रेजों के लिए राजपूत समाज ने लड़ा है। अंग्रेजों की सेना में राजपूतों का रेजिमेंट था जो आज भी भारतीय सेना में है।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने अंग्रेजों के साथ मिलकर द्वितीय विश्व युद्ध की लड़ाई लड़ी है। कुछ दिन पहले आजादी के वक्त की आरएसएस का एक पत्र भी वायरल हो रहा था जिसमे संघ के लोगों से ये अपील की गई थी कि वो आजादी की लड़ाई में अंग्रेजों के खिलाफ न लड़े।

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