मैंने कुछ समय पहले लिखा था कि छत्तीसगढ़ की जेलों में ऐसी आदिवासी लड़कियां बंद है। जिनके साथ पुलिस वालों ने बलात्कार किए हैं। थाने में उन्हें बिजली के करंट दिए गए हैं और बुरी तरह मारपीट करी गई है।

पर सरकार ने मुझे नक्सली कहा। सोनी सोरी के साथ थाने में मारपीट की गई। उन्हें बिजली के झटके दिए गए और कोख में पत्थर भर दिए गए। सोनी सोरी ने जेल के भीतर से खत लिखकर बताया था कि जेल के भीतर ऐसी लड़कियां मौजूद है
जिनके साथ मुझसे भी ज्यादा बुरा सुलूक पुलिस द्वारा किया गया है।

फिर सरकार ने सोनी सोरी को पागल घोषित करने की कोशिश की। फिर जब खुद एक महिला जेलर ने कहा कि जेल में मैंने ऐसी छोटी-छोटी आदिवासी बच्चियों को देखा है जिनकी कलाइयों और स्तनों पर बिजली से जलाने के निशान थे, तो सरकार ने अपनी ही जेलर की बात सुनकर इस मामले की जांच करवाने की बजाय उल्टे जेलर को ही सस्पेंड कर दिया।

और जेलर की ही जांच करवाने लगे। सारी दुनिया में जेल के भीतर इंटरनेशनल रेड क्रॉस जा सकता है। रेड क्रॉस अफगानिस्तान और सूडान तक की जेलों के भीतर जा सकता है। लेकिन Red Cross संस्था को छत्तीसगढ़ की जेलों के भीतर नहीं जाने दिया जाता। छत्तीसगढ़ की जेलें पीड़ित आदिवासी लड़कियों से भरी हुई है।

इन आदिवासी लड़कियों के साथ पुलिस द्वारा भयानक यौन अपराध किए गए हैं। भारत का सभ्य समाज जिन यौन अपराधों के लिए बहुत शुद्धतावादी और नैतिकतावादी बनता है, वह सारे अपराध सरकार द्वारा अपने ही देश की आदिवासी लड़कियों के साथ बड़े पैमाने पर किए जा रहे हैं।

लेकिन ना तो भारत की न्याय प्रणाली ना ही भारत की मीडिया और ना ही भारत का पढ़ा लिखा समाज आदिवासियों के साथ होने वाले इन अत्याचारों के बारे में ध्यान दे रहा है। ना अपना मुंह खोल रहा है। ताजा खबर यह है कि जिस महिला जेलर वर्षा डोंगरे ने जेल के भीतर होने वाले इन अत्याचारों के बारे में अपनी अंतरात्मा की आवाज पर मुंह खोला था और जिन्हें सरकार ने निलंबित कर दिया था।

सरकार अब नए सिरे से उन्हें परेशान करने में लग गई है। वर्षा डोंगरे दलित हैं शायद इसलिए भी उनकी अंतरात्मा ने दूसरे कमजोर समुदाय की महिलाओं के साथ होने वाले अत्याचारों के विरुद्ध आवाज उठाई। अगर भारतीय समाज अपने कमजोर समुदायों पर ज़ुल्म करेगा तो भारत को धर्म, संस्कृति, न्याय और लोकतंत्र की बात करनी बन्द कर देनी चाहिये।

(ये आर्टिकल समाजिक कार्यकर्ता हिमांशु कुमार ने लिखा है।)

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