“इस बार दंगा बहुत बड़ा था, ख़ूब हुई थी ख़ून की बारिश
अगले साल अच्छी होगी फ़सल मतदान की”

गोरख पांडेय की इन पंक्तियों का सच रोज़ हमारे सामने आ रहा है। जब कासगंज में भाजपाई सांसद ने हिंदुओं को भड़काने वाला भाषण दिया तब भी यही सच सामने आया। जब अख़लाक़ की हत्या के आरोपी के मरने पर भाजपाइयों ने उसके घर जाकर उसके साथ खड़े होने की बात कही तब भी यही सच सामने आया था।

जब आरएसएस प्रवक्ता राकेश सिन्हा ने टीवी स्टूडियो में मुसलमानों को 15 सेकंड में साफ़ करने की बात कही तब भी यही सच सामने आया। पूरा देश कासगंज नहीं, काशगंज में बदलता जा रहा है। काशगंज… काश मीडिया देशद्रोही संघियों के साथ मिलकर दलितों, मुसलमानों आदि को लगातार असुरक्षित बनाने के काम में नहीं लगा होता।

काश संविधान की शपथ लेकर पद पर बैठने वाले हमारे पीएम, सीएम आदि संविधान को कमज़ोर करने वालों को रोकने की नैतिकता दिखाते। काश यह समझा पाना आसान होता कि हिंदुओं और मुसलमानों, दोनों को असुरक्षित करने वाली ग़रीबी और बेरोज़गारी पैदा करने वाले लोग ही गंगा-जमुनी तहज़ीब के दुश्मन हैं।

काश जनता यह सवाल करती कि 2017 में 67 करोड़ भारतीयों की संपत्ति में केवल एक प्रतिशत की वृद्धि क्यों हुई और जय अमित शाह की आय में 16,000 गुना वृद्धि कैसे हो गई। ऐसे सवालों को दबाने के लिए ही हिंसा की संस्कृति बनाई जा रही है। भयानक हिंसा भी एक बड़ी आबादी को सहज-सामान्य लगने लगी है। इससे ज़्यादा भयानक क्या हो सकता है?

‘हम, भारत के लोग’ सही सवाल करना जारी रखेंगे और न केवल सवाल करेंगे, बल्कि जवाब भी सामने रखेंगे। हमारी राजनीति ही हमारा जवाब है। जिस गंगा-जमुनी तहज़ीब ने पूरे विश्व में हमारे देश की एक अनोखी और प्यारी तस्वीर बनाई, उसे हम हर हाल में ज़िंदा रखेंगे।

हम देश को ‘काशगंज’ या ‘लाशगंज’ में नहीं बदलने देंगे। जो नेता चुनावी जीत के लिए पूरे देश को आग में झोंकने को तैयार हैं, उन्हें हर हाल में हराएँगे।

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