अभी तक गुजरात में जो समीकरण बने थे उतने से ही भाजपा बुरी तरह से चिंतित थी लेकिन अब इस सत्ताधारी पार्टी को बेचैन करने के लिए पिछले 3 दिनों के राजनीतिक घटनाक्रम ही काफी है।

पहले हार्दिक पटेल की अगुवाई में पाटीदार समाज की नाराजगी, जिग्नेश मेवाणी की अगुवाई में दलित समाज की नाराजगी झेल रही भाजपा के लिए कम मुसीबतें नहीं थी कि अब प्रदेश के सबसे बड़े सबसे ज्यादा संख्या वाले ओबीसी के सबसे मुखर नेता अल्पेश ठाकोर कांग्रेस का हाथ थाम लिया। साथ ही आज राहुल गांधी केस साथ मंच साझा करके विशाल जनसैलाब के जरिए दिखा दिया कि उनके इस निर्णय से पिछड़ा वर्ग की जनता सहमत है।

जिस प्रदेश में लगभग 54 प्रतिशत आबादी पिछड़ों की हो वहां उनका रुझान बेहद मायने रखता है। भाजपा के लिए इसलिए भी ये अहम है क्योंकि मुस्लिमों और दलितों में पहले से विश्वास खो चुकी इस सत्ताधारी पार्टी के लिए सबसे बड़ी उम्मीद वैश्य समाज और OBC ही हैं ।

जीएसटी के बाद घोर विरोध करने के बावजूद व्यापारी समाज की घोषणा नहीं की जा सकती कि ये  किसके साथ जाएगा लेकिन सकल रूप से देखें तो OBC वोट बैंक में सेंधमारी करते ही कांग्रेस बढ़त हासिल कर लेगी ।

जिस राज्य की आबादी में 14 -15% आदिवासी हों, जिन्हें नर्मदा के बांध की ऊंचाई की परियोजना के जरिए बेघर कर दिया गया हो ,उनसे तो उम्मीद करना भी भाजपा गलतफहमी ही होगी ।

दूसरे, उना में युवकों की पिटाई के बाद हुए बहुत बड़े दलित आंदोलन के बाद तो मानो दलित समाज ने भाजपा का पूरी तरह से बहिष्कार कर रखा है। उनके सबसे बड़े नेता जिग्नेश मेवाणी ने किसी भी कीमत पर भाजपा के साथ न जाने की कसम खा रखी है। प्रदेश की कुल आबादी का 7% दलित समाज के लोग हैं ।

प्रदेश में लगभग 9 से 10% मुसलमान तो पूरी तरह से भाजपा के विरोध में वोट करेंगे, इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता।

दलित -आदिवासी-मुस्लिम तो स्वाभाविक रूप से कांग्रेस के साथ जा खड़े हुए हैं, अब अगर एक युवा नेतृत्व दिखाकर ओबीसी समाज का एक तिहाई वोट भी भुनाने में कांग्रेस  सफल रहती है तो उसे रोकना नामुमकिन हो जाएगा। इसके साथ ही प्रदेश में ढाई दशक से शासन कर रहे भाजपा को सत्ता से बेदखल होना पड़ेगा ।

अल्पेश ठाकोर अपनी पहली परीक्षा में सफल हुए हैं, उनके द्वारा आयोजित रैली में राहुल गांधी का शामिल होना इसलिए भी सफल माना जाएगा कि हजारों-हजार की भीड़ ने दिल खोलकर स्वागत किया। यानी कि पिछले कुछ वर्षों में अल्पेश ने अपने आंदोलन के जरिए बड़ा असर पैदा किया है यह बात सिद्ध हो जाती है।

हालांकि उनका आंदोलन पहले ठाकोर समाज की एकता से शुरु हुआ था लेकिन वह धीरे-धीरे ओबीसी के नेता बन गए और अब SC ST OBC को एक बैनर तले लाकर बहुजन एकता का भागीरथ प्रयास कर रहे हैं । अगर उनका असर कायम रहा तो कांग्रेस को लगभग साठ सीटों पर सीधी बढ़त हासिल हो जाएगी।

पिछले चुनावों को देखें तो भाजपा और कांग्रेस में भले सीटों का बड़ा फासला रहा हो लेकिन वोट प्रतिशत का फासला महज 9 प्रतिशत रहा है। इस बार सत्ताधारी पार्टी को भारी नुकसान की संभावना है जिससे न सिर्फ ये फासला ख़त्म होने के आसार हैं बल्कि तस्वीर उलट भी सकती है।

भले ही हार्दिक पटेल और जिग्नेश मेवाणी कांग्रेस में शामिल नहीं हो रहे हैं लेकिन इस चुनाव में उनका भी बाहर से समर्थन ही माना जा रहा है, ऐसे में राज्य में अपनी सत्ता बचाए रखना भाजपा के लिए बड़ी चुनौती बन गया है।

ये चुनाव इसलिए भी ज्यादा अहम हो जाता है कि मोदी-शाह के गृह राज्य गुजरात में अगर कांग्रेस उन्हें हराने में सफल हुई तो आगामी लोकसभा चुनाव में इसे सबसे बड़ी चुनौती मानने से इनकार नहीं किया जा सकता।

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