मिल रही ख़बरों के अनुसार कांग्रेस ने गुजरात में अपनी प्रेस कॉन्फ्रेंस में आने से समाचार चैनल Times Now पर प्रतिबन्ध लगा दिया है।

कांग्रेस ने Times Now पर प्रतिबन्ध का कारण समाचार चैनल का पक्षपाती नज़रिया बताया। उसका आरोप है कि ये चैनल पत्रकारिता के सिद्धांत भूलकर लगातार वर्तमान सत्ताधारी के पक्ष में चीज़ों को तोड़ मरोड़कर पेश कर रहा है और जनता के हित की चिंता नहीं कर रहा है।

इस बात में कोई दो राय नहीं है कि लोकतान्त्रिक और पत्रकारिता की आज़ादी के नज़रिए से ये एक गलत फैसला है। इस फैसले का विरोध भी होना चाहिए। लेकिन इस सब के साथ एक और सवाल भी दिमाग में लगातार आ रहा है। इस देश में मीडिया के इस बदलते दौर में क्या इस तरह का प्रतिबन्ध मीडिया के लिए भी सोंचने का विषय है।

मीडिया की समाज में काफी महत्त्वपूर्ण भूमिका है। मीडिया को लोकतांत्रिक व्यवस्था का चौथा स्तंभ भी कहा जाता है, क्योंकि इसकी ज़िम्मेदारी देश और लोगों की समस्याओं को सामने लाने के साथ-साथ सरकार के कामकाज पर नज़र रखना भी है। लेकिन पिछले कुछ समय से मीडिया की कार्यप्रणाली और रुख पर सवाल उठने शुरू हो गए हैं।

मीडिया इस समय काफी बदल रहा है। मीडिया के काम करने के तरीके और चरित्र में बहुत बदलाव आया है। लेकिन सवाल है कि यह बदलाव कितना सही और कितना गलत है। जिस तरह की पत्रकारिता इस समय हो रही है उसके लिए ‘गोदी मीडिया’ और ‘सुपारी मीडिया’ जैसे शब्द प्रयोग होने लगा है।

ब्रिटिश काल में मीडिया की शुरुआत से लेकर आजतक सत्ताधारी और राजनीतिक पार्टियाँ यही कोशिश करती रही हैं कि मीडिया उनके पक्ष में लिखे। विपक्ष को भी इस बात से कभी बहुत से ज़्यादा दिक्कत नहीं रही है क्योंकि एकदिन उसे भी सत्ता में आना है। लेकिन आज हालात ऐसे हो चुके हैं कि एक राजनीतिक पार्टी को मीडिया को बताना पड़ रहा है कि आप अपने उद्देश्य और सिद्धांतों से पूरी तरह भटक चुके हैं।

ये मीडिया के लिए बहुत सोंचनीय स्तिथि है। विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र में जब राजनीतिक पार्टियाँ मीडिया को उसके सिद्धांत याद दिलाने लगे तो ये समझना मुश्किल नहीं है कि वो मीडिया नैतिकता की सभी सीमाएं लांघ चुका है। राजनीतिक और सामाजिक गलियारों में अलग-अलग दृष्टिकोण चीज़ों को लेकर हो सकते हैं लेकिन मीडिया की कसौटी ही ये है कि वो स्वयं को सबसे बचाकर निष्पक्ष तरीके से चीज़ों को दिखाए।

Times Now की बात करें तो उसे वर्तमान सरकार का करीबी माना जाता है। उसकी ख़बरों से लेकर डिबेट शो के मुद्दों तक में ये चीज़ साफ़ दिखाई देती है। इस मीडिया समूह के मालिक समीर जैन पर भी पत्रकारिता के सिद्धांतों को छोड़ पूरी तरह से बाज़ारवादी होने के आरोप लगते रहे हैं।

लेकिन इसके लिए Times Now ही ज़िम्मेदार नहीं है। मीडिया को देखे तो उसकी कवरेज में काफी बदलाव आया है। कई बार ऐसा लगता है कि मीडिया व्यक्ति-केंद्रित हो चुका है। आजकल टीवी चैनलों पर नेता ही दिखाई देते हैं। वो नेता जो कह रहे हैं वो कितना सही और गलत है इस बात को छोड़ उनके शब्दों को परमसत्य समझा जाता है। अपमानजनक बयानों को हमला बताकर उन नेताओं की छवि को बड़ा बनाने की कोशिश की जाती है।

राजनीति के अलावा ऐसा लगता है कि मीडिया अपनी सामाजिक जिम्मेदारी से भी भाग रहा है। सामाजिक खबरें कम दिखाई देती हैं। देश में बहुत सारी समस्याएं हैं, लेकिन मीडियो को शायद उनसे कोई सरोकार नहीं है। चाहे हम किसानों की आत्महत्या की बात करें या फिर महिलाओं पर होने वाले अत्याचारों या अपराधों की, मीडिया में ऐसे मामलों को जगह देने में या तो कंजूसी दिखाई जाती है या फिर ज़रूरी संवेदनशीलता नहीं बरती जाती।

गाँव की रिपोर्टिंग न करके सिर्फ शहरों की लुच समस्याओं दिखाया जाता है। जिस देश की अधिकतर जनता गाँवों में रहती है वहां की हकीकत मीडिया शहरों में खड़े मॉल और शॉपिंग कॉम्प्लेक्स को बताता है।

इसलिए ये सिर्फ राजनीतिक न होकर सामाजिक भी है। प्रतिबंध लगाना बिलकुल निंदनीय है लेकिन इस निंदा के बाद आज भारतीय मीडिया को अपने गिरेबान में झाकने की ज़रूरत है और इस बात पर विचार करने की भी कि पैसे और ताकत की होड़ ने उसे आज एक ऐसी जगह लाकर खड़ा कर दिया है जहाँ उसे राजनीतिक पार्टियों से पत्रकारिता के सिद्धांतों को लेकर फटकार मिल रही है।

 

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