देश के ‘चंद लोग’ जिन्हें भीड़ कहा जाता है वो कितनी सक्रिय है देखिए-

1..★एक फ्रिज में गोश्त था,
‘शायद’ गाय का था(कद्दू माता कहूंगी)

100 लोग आए और एक आदमी को पीट-पीट कर मार डाला

2..★ एक लोडर में गाय थी,
‘शायद’ कटने जा रही थी
लोगों ने पीट पीट कर मार डाला (ड्राइवर पर भीड़ की नजर पड़ी भी नहीं वो बच गया)

3..★ कुछ आदमी थे
‘शायद’ बच्चा चुराए थे
लोगों ने पीट पीट कर मार डाला।

अब जरा कुछ मुख़्तलिफ़ नजारा और भीड़–

1… एक लड़की सड़क किनारे मौत से जूझ रही है लहूलुहान उसके बदन पर कपड़े का एक रेशा नहीं है एक लड़का जिसका पैर टूटा है वो भी निर्वस्त्र है, ‘शायद’ मर जाएगी मगर ‘लोगों’ ने मदद तो दूर एक कपड़ा तक नहीं डाला…

2…एक लड़की की ट्रेन में कुछ लड़कों से झड़प हो जाती है वो उसे ट्रैन से नीचे फेंक देते हैं,पैर कट जाता है,’शायद’ ही जिंदा बचे पर ‘लोगों’ ने न् बचाया न् पुलिस को इत्तेला दी… रेलवे को घटना की जानकारी ही दे देते तो शायद उसका कटा पैर चूहे न् कुतरते

3.. राह चलती किसी महिला का दुपट्टा खींच जाता है, कहीं मास मोलेस्टेशन हो जाता है पर ‘लोग’ कुछ नहीं करते

4. किसी को डायन कह कर जिंदा जलाया जाता है, पर ‘लोग’ कुछ नहीं कहते

5.दो युवा अपनी मर्ज़ी से एक कमरे में ‘शायद’ अनैतिक काम कर रहे हैं उन्हें लोग पकड़ लाते हैं मगर अपनी ही सोसाइटी म् अकेले रहने वाले बुजुर्ग की चोर हत्या कर देते हैं और लोगों को कुछ करना तो दूर पता भी लाश की बू से चलता है…

कुछ ही मामलों में भीड़ इतनी जिम्मेदार कब से हो गयी,
भीड़ का मजहब, जाति, विचारधारा कब से हो गयी??

ये भीड़ हो ही नहीं सकते
ये वही किराए के टट्टू हैं

आज खामोश हैं तो ठीक रहिये। पर कल आप भी इस भीड़ का शिकार हो सकते हैं।

लेखक-आकांक्षा अवस्थी

नोट- यह पोस्ट आकांक्षा अवस्थी ने फेसबुक पर लिखी है। जिसको बोलता हिंदुस्तान ने सोशल वाणी में जगह दी है।

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