एक जनवरी को भीमा-कोरेगांव में दलित समाज के द्वारा 200वी वर्षगाठ आयोजन के दौरान कुछ उग्र हिन्दू संगठनों द्वारा कथित तौर पर हिंसा की गई थी जिसके विरोध में दलित समाज ने महाराष्ट्र बंद का एलान भी किया था। इसके बाद महाराष्ट्र में जातिवाद और जाति उत्पीड़न का प्रश्न एक बार फिर से उभर के आया है।

ये आरोप भी लगाए जा रहे हैं कि इस आयोजन में नक्सलवादी तत्व शामिल थे न कि दलित और कट्टर हिंदुत्व संगठनों का आयोजन में हुई हिंसा से कोई लेना देना नहीं है और न ही महाराष्ट्र में दलित उत्पीड़न जैसा कुछ है।

यूं तो महाराष्ट्र में दलित उत्पीड़न का इतिहास बाबा साहेब आंबेडकर अपने कई लेखों में बता चुके हैं। लेकिन वर्तमान स्थिति पर भी नज़र डाली जाए तो समझ आ सकता है कि महाराष्ट्र में दलित विरोध प्रदर्शन पर क्यों उतर आए हैं, वहां उनकी क्या स्थिति है और कैसे ये मामला साम्प्रदायिक नहीं बल्कि आर्थिक और सामाजिक है।

महाराष्ट्र में दलितों पर अत्याचार

वर्ष 2016 के आकड़ों के अनुसार महाराष्ट्र में दलितों पर उच्च जाति द्वारा उत्पीड़न के मामलों में 45 हत्याएँ, 60 मामले हत्या के प्रयास के, 35 गंभीर चोटों के मामले, महिलाओं पर 352 हमले, 40 अपहरण, 220 बलात्कार, 235 दंगों के मामलों आदि के साथ, दलित अत्याचार (अत्याचार निवारण अधिनियम, पी.ओ.ए.) से निपटने के लिए विशेष कानून के साथ आई.पी.सी. के तहत कुल 1,518 मामले सामने आते हैं।

इन मामलों के अलावा, दलितों के खिलाफ भेदभाव को रोकने के लिए 218 मामले केवल पी.ओ.ए. के तहत पंजीकृत किए गए, सिविल राइट्स संरक्षण अधिनियम के तहत 14 अन्य मामले दर्ज किये गए। इस तरह सिर्फ एक वर्ष में ऐसे 1,750 मामले सामने आए जिनमें 1,839 दलित पीड़ित हैं। इस संख्या के हिसाब से राज्य में हर दिन दलितों के खिलाफ उत्पीड़न के लगभग पाँच मामले होते हैं।

दलित उत्पीड़न के खिलाफ करवाई की बात करे तो इसमें राज्य की भाजपा सरकार का प्रदर्शन ख़राब नज़र आता है। एन.सी.आर.बी. आंकड़ों से पता चलता है कि दलितों के लिए विशेष कानूनों के तहत दर्ज मामलों में सज़ा दर 10% से अधिक नहीं है।

बेरोज़गारी और भूमिहीनता

2016 में शहरी महाराष्ट्र में दलित पुरुषों के बीच बेरोज़गारी की दर तथाकथित ऊँची जातियों से दोगुनी थी। ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों को मिलाया जाये तो दलितों में बेरोज़गारी की दर तथाकथित ऊँची जातियों की तुलना में 13% अधिक थी।

40% से ज़्यादा दलित मज़दूरों को पूरे वर्ष काम नहीं मिलता। अन्य पिछड़ी जातियों (ओबीसी) में ऐसे श्रमिकों का हिस्सा 32% है और उच्च जातियों में 26%। यह दिखाता है कि मौजूदा रोज़गार संकट के तहत दलित समुदाय दूसरों की तुलना में अधिक पीड़ित है। इनकी नौकरी पाने की संभावना न केवल कम है, बल्कि नौकरी न पाने की लंबी अवधि के बीच उनके लिए पर्याप्त रोज़गार भी नहीं है।

महाराष्ट्र में अन्य जातियों के मुकाबले दलितों के पास भूमि की भी कमी है। ऐसा अनुमान है कि 55% दलित परिवारों के पास कोई भूमि नहीं है।

आरक्षण से ज़्यादा मेहनत से अवसर पा रहे दलित

आरक्षण की बात करे तो वो भी महाराष्ट्र दलितों के लिए कोई जादू की छड़ी की भूमिका नहीं निभा रहा है। दलित समाज के बच्चों को कम संसाधन और ज़्यादा समस्याएँ होने के बावजूद ज़्यादा मेहनत करके अवसर प्राप्त करने पड़ रहे हैं।

2015 में टी.आई.एस.एस. (TISS) द्वारा किए गए एक अध्ययन से पता चला है कि लगभग 8% दलित घरों में आरक्षण के माध्यम से शैक्षिक संस्थानों में प्रवेश मिला था।

जबकि लगभग 67% ने कहा कि ‘प्रशासनिक समस्या’ के कारण उन्होंने अवसर खो दिया और केवल 18% ने पोस्ट मैट्रिक छात्रवृत्ति का लाभ उठाया है और 22% को किसी भी प्रकार की फ्रीशिप या छात्रवृत्ति नहीं मिली थी।

इस सबके बावजूद महाराष्ट्र में उच्च शिक्षा में दलितों की 30% हिस्सेदारी है जो राष्ट्रीय औसत 20% से अधिक है। ये दिखाता है कि महाराष्ट्र के दलित युवा केवल आरक्षण के सहारे नहीं बल्कि अतिरिक्त मेहनत के बल पर अवसर प्राप्त कर रहे हैं।

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