“तूने ओ सनम, ढाए हैं सितम, तो ये तू भूल न जाना, के न तुझपे भी इनायत होगी, आज रुसवा तेरी गलियों में मोहब्बत होगी…”
लाखो दिलों पर राज करने वाले किशोर कुमार एक ऐसे महान गायक थे जिन्होंने अपनी मधुर आवाज से इतिहास रच दिया। किशोर कुमार की आवाज आज भी लोगो के दिल में जिंदा है,जो उन्हें प्यार और दर्द के नगमे सुनाती है । आज उनकी बरसी के दिन उसी प्यार और दर्द की आवाज के जादूगर की जिन्दगी से आपको रूबरू करवाना चाहते हैं।

आपको बता दें कि किशोर कुमार ने सैकड़ों मुहब्बत भरे गाने गए हैं लेकिन असल ज़िन्दगी में लोगों के साथ के लिए मोहताज रहे। खुद को लोगों से दूर रक्खा या दूर होते ही रहे, ये वो खुद भी नहीं समझ पाए।

किशोर कुमार ने पर्सनल और प्रोफ़ेशनल दोनों ही ज़िंदगियों में काफी मुसीबत झेली है। मुहब्बत भरे गाने गाने वाले किशोर कुमार असल ज़िन्दगी में लोगों के साथ के मोहताज रहे। किशोर कुमार ने चार शादिया की थी। उनकी पहली पत्नी गायक और अभिनेत्री रुमा घोष थी उनकी ये शादी 1950 से 1958 तक चली थी।

लेकिन उनकी दुसरी पत्नी मधुबाला थी, मधुबाला के साथ उन्होंने होम प्रोडक्शन चलती का नाम गाड़ी(1958) और झुमरू(1961) में कई फिल्मों में काम किया है। वहीं जब किशोर ने मधुबाला को शादी के लिए प्रपोज किया तब वो काफी बीमार चल रहीं थी। और इलाज के लिए लंदन जाने वाली थी क्यों कि उनके दिल में छेद था। उसी दौरान उन्होंने रुमा से शादी कर ली थी, लेकिन कुछ अरसे बाद रुमा से तलाक के बाद, 1960 में किशोर कुमार ने इस्लाम कबूल कर अपना नाम अब्दुल रख लिया था। और किशोर ने फिर मधुबाला से शादी कर ली थी। धर्म परिवर्तन करने के बाद उनके परिवार वालों ने कभी मधुबाला को नहीं अपनाया|

1969 में मधुबाला की मौत हो गयी और उन्होंने योगिता बाली से शादी कर ली जो सिर्फ दो साल तक चली। फिर किशोर कुमार ने लीना चंदावर्कर से शादी की और 1980 से लेकर अपनी मौत तक उनका साथ बना रहा। लेकीन मधुबाला को न पाने की कस्क उनके दिल में हमेशा चुभती थीं। और किशोर दा  ने अपने इस दर्द को नगमों में तबदील कर दिया । अपनी जिन्दगी के तमाम मुश्किलों के बाद भी वो हमेशा से यही कहते रहते ” गाता रहे मेरा दिल, तू ही मेरी मंजिल, कहीं बीते ना ये रातें, कहीं बीते ना ये दिन “!!!

अब आपको किशोर दा के प्रोफेशनल लाइफ से जुड़े किस्से से रु-ब-रु कराते हैं-

आपको बता दें कि मध्य प्रदेश के खंडवा जिले में एक गांगुली परिवार में जन्मे किशोर कुमार का बचपन का नाम आभास कुमार गांगुली था। किशोर कुमार अपने भाई बहनों में सबसे छोटे थे। उनके सबसे बड़े भाई अशोक कुमार एक महान और मशहूर अभिनेता थे।

किशोर कुमार बचपन से ही के.एल सेहगल के फैन थे और उनसे ही इंस्पार्ड हो कर गाना गाते रहते थे। फिर किरोश दा ने अपने बड़े भाई अशोक की मदद से बॉम्बे टॉकीज में कोरस सिंगर बनने  मौका मिल गया। और इस तरह उन्होंने अपने  करियर की शुरुआत की। किशोर कुमार पहली बार अशोक कुमार की फिल्म शिकारी (1946 ) में नजर आए जहा उनको अभिनय करने का मौका मिला। संगीतकार खेमचंद ने उनको पहले बार फिल्मो में गाना गाने का मौका दिया और उन्होंने 1948 में देवानंद की फिल्म जिद्दी के लिए “मरने की दुआए क्यों मांगू ” गाना गाया।


किशोर कुमार ने संगीत की कोई तालिम हासिल नहीं की थी और इसलिए संगीतकार उनको गाने देने में कतराते थे। लेकिन किस्मत का पासा पलटा और संगीतकार सलील चौधरी ने उनकी आवाज सुनकर उनको गाने के कई मौके दिए।
किशोर कुमार का पचास के दशक की शुरुआत में गाया गाना – “ईना मीना डीका…” एक ऐसा गाना बन गया जो आज भी बज जाए तो आपके चेहरे पर एक मुस्कान आ ही जाए। फिर इसके बाद किशोर की फिल्म चलती का नाम गाडी उनकी अभिनय के तौर पर एक सफल फिल्म रही जिसमे कार मेकेनिक के रूप में उनके और मधुबाला के बीच रोमांस को दिखाया गया है। इस फिल्म में उनका गाना “एक लडकी भीगी भागी सी ” बहुत पॉप्यूलर हुआ था।

 

फिर किशोर दा कि मुलाक़ात हुई एस.डी. बर्मन से, उन्होंने उनसे कहा तुम्हें अपनी आवाज़ को ढूंढना चाहिए। किशोर कुमार ने अपनी आवाज़ ढूंढी और गाया उस सिंगर के लिए जिसके लिए सबसे पहले गाया था – देवानंद. फिल्म फंटूश. का गाना – “देने वाला जब भी देता …”

गौरतलब है कि 1969 में उन्होंने आराधना फिल्म में “मेरे सपनो की रानी ” गाना गाया जिसने उनको एक स्टार बना दिया और इसी फिल्म के गाने “रूप तेरा मस्ताना ” के लिए उनको पहला फिल्मफेर अवार्ड भी मिला था। सत्तर और अस्सी के दशक में उन्होंने मशहूर अभिनेताओ राजेश खन्ना , अमिताभ बच्चन , धर्मेन्द्र ,जीतेंद्र ,संजीव कुमार ,देवानंद ,संजय दत्त ,अनिल कपूर ,दिलीप कुमार ,प्राण ,रजनीकान्त ,गोविंदा और जेकी श्राफ के साथ काम किया। बता दें कि किशोर कुमार ने मो.रफी , मुकेश , लता मंगेशकर , आशा भोंसले जैसे दिग्गज गायकों के साथ भी काम किया है।

और फिर 13 अक्टूबर 1987 को किशोर कुमार का देहांत हो गया और इत्तेफाक से उस दिन उनके बड़े भाई अशोक कुमार का जन्मदिन था। उनकी आखरी ख्वाहिश थी कि उनका अंतिम संस्कार खंडवा में हो। वो कहते थे बम्बई में किसी का अंतिम संस्कार सेलिब्रिटियों का गेट-टुगेदर होता है। और उन्हें शांति और मुक्ति चाहिए थी। किशोर कुमार की मौत के बाद भी उनके गाने आज भी हमारे दिलो में जिंदा हैं।

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