नोटबंदी और जीएसटी ने दिल्ली के कपड़ा उद्योग को बर्बाद कर दिया है। बिज़नस स्टैंडर्ड की एक रिपोर्ट के मुताबिक नोटबंदी और जीएसटी ने इस उद्योग को बर्बादी की कगार पर लाकर खड़ा कर दिया है। इसका सबसे ज़्यादा असर बिहार और उत्तरप्रदेश से आए, नॉएडा में रह रहे मज़दूर वर्ग को हुआ है।

पिछले आठ महीनों से बबीता सिंह, दो किलोमीटर में फैले नोएडा होसरी कॉम्प्लेक्स की हर गली में अपने लिए दर्जी की नौकरी की तलाश कर चुकी हैं।

वह सुबह 7 बजे घर से नौकरी ढूँढने निकल जाती हैं और 11 बजे तक जगह- जगह ठोकरे खाती रहती हैं, दरअसल ये समय काम की पहली शिफ्ट का होता है। लेकिन अभी तक कारखाने में बुलाया जाने की कोई उम्मीद नहीं दिख रही है।

बबिता 30 साल की हैं, वो उत्तरप्रदेश के बुलंदशहर से ताल्लुक रखती हैं। वो बताती हैं कि गाँव में उनके परिवार के लिए कुछ नहीं बचा था इसलिए बहतर जीवन की तलाश में वो सात साल पहले परिवार के साथ दिल्ली आ गईं।

बबिता जिस कपड़ा फैक्ट्री में छह साल से काम कर रही थी वो इस साल मार्च में बंद हो गई। नोटबंदी के बाद कारखाने की स्तिथि लगातार बिगड़ रही थी। बबिता जैसे हज़ारों मज़दूर हैं जिन्होंने अपनी नौकरियां गवायीं।

इनाशी देवी कहती हैं कि “वो बोल रहे हैं कि जीएसटी है, नौकरी नहीं मिलेगी।” सड़कों पर नौकरी ढूँढ़ते इन लोगों की भीड़ देखिए। “चाहे आप पुरुष हैं या महिला, शिक्षित हैं या मेरी तरह अनपढ आपको नौकरी नहीं मिलेगी।”

गौरतलब है कि IndiaSpend की दिसम्बर 2016 की रिपोर्ट के मुताबिक नोटबंदी ने कपड़ा उद्योग को भारी नुकसान पहुँचाया है क्योंकि इस उद्योग में 80% काम असंगठित क्षेत्र का है जहाँ ज़्यादातर लेनदेन नकदी में होता है।

40% लोगों की नौकरियां गईं

नोएडा में एक एक्सपोर्ट फैक्ट्री के मेनेजर कहते हैं कि “धंधा उठ नहीं पाया।” वो कहते हैं कि यहाँ कि सड़कों पर आप नोटबंदी की मार देख सकते हैं। लगभग 40% श्रमिकों की नौकरियां चली गईं।

एपैरल एक्सपोर्ट प्रमोशन काउंसिल के सदस्य और नोएडा परिधान निर्यात क्लस्टर के प्रमुख ललित ठुक्राल बताते हैं कि नोएडा-ग्रेटर नोएडा क्षेत्र में बिज़नेस 40% कम हो गया है। मेरी गणना यह है कि हाल के महीनों में लगभग 50-70 यूनिट्स बंद हो गए हैं।

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