जीएसटी के आने से जहाँ एक और कई हलकों में इसको लेकर आक्रोश है वहीँ दूसरी तरफ फायदेमंद और बेहतर बताने वाले लोग भी इसकी पेचीदगी से असमंजस में नज़र आ रहे हैं। जीएसटी के दम पर अपनी वाहवाही बटोरने वाली इस सरकार का ये दावा था की इससे आम जनता को राहत मिलेगी और रोजमर्रा  की चीजों के साथ साथ तमाम वो सभी उपकरण भी सस्ते हो जाएंगे जो जरूरतमंद लोगों के लिए प्रासंगिक हैं।

लेकिन सरकार का ये मात्र एक खोखला दावा भर था। इस बिल के लागू होने से एक और जहाँ विद्यार्थियों की जेबों पर अत्यधिक बोझ पड़ा है वहीँ दूसरी तरफ कुछ ऐसे तबके भी हैं जो इसकी कठोर मार झेल सकते हैं। उन्हीं में से एक तबका है विकलांगों का।

जहाँ सरकार विकलांगों के लिए अनेक योजनाओं, अभियानों व उनकी सुगम्यता तथा शिक्षा रोजगार इत्यादि के लिए स्वयं को प्रतिबद्ध बताती है। और इसके लिए बार बार अपनी पीठ भी थपथपाने से नहीं चूकती वहीँ दूसरी और उनसे सम्बंधित उपकरणों पर 5 से 17 फीसदी तक जीएसटी का बोझ भी उनके कन्धों पे डाल देती है।  भाई ये पैंतरा समझ में नहीं आया, एक ओर तो किसी को चलने के लिए बैसाखी  थमा दीजिए, लेकिन उसे चलने को मना भी कर दीजिए।

यह गौरतलब है की सरकार द्वारा सभी चीज़ों पे 5 से लेकर 28 प्रतिशत तक टैक्स लगाने का प्रावधान है, जिसके तहत खाने-पीने से लेकर स्टेशनरी तक पे भी जीएसटी की मार पड़ी है। फिर चाहे वो विकलांगों द्वारा इस्तेमाल किये जाने वाले दैनिक उपकरण ही क्यों न हों।

देश की कुल आवादी का लगभग 6 फीसदी हिस्सा विकलांगों का है, और ये गौरतलब है कि अभी तक विकलांगों द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले सभी यंत्रों पर कोई टैक्स का प्रावधान नहीं था।

ये स्वाभाविक है की विकलांगों को अपना जीवन सामान्य रूप से जीने व आत्मनिर्भरता हेतु टेक्निकल व कृत्रिम संसाधनों तथा उपकरणों की आवशकता पड़ती है। और अब दैनिक आवश्यकताओं पर भी सरकार टैक्स वसूलना चाहती है। उनके शिक्षा से, लेकर चलने-फिरने तक के सभी बुनियादी उपकरणों पर टैक्स लगाने का प्रावधान भी इस बिल में निहित है।

जिसके तहत बैसाखी, व्हील चेयर, ट्राई साइकल, कृत्रिम अंग, घुमने वाले सहायक यंत्र इत्यादि। पर 5 फीसदी जीएसटी अथवा ब्रेल पेपर, ब्रेल घड़ियाँ, टाकिंग बुक्स और श्रवण यंत्र आदि। पर 12% तक टैक्स। और इतना ही नहीं बल्कि ब्रेल टाइप-राइटर पे 17 प्रतिशत तक जीएसटी लगाया गया है।

सरकार की इस संवेदनहीनता का विरोध देश भर के विकलांग कर रहे हैं। और इस मुद्दे को लेकर कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने भी सरकार की मंशा पर सवाल उठाया है और इस असंवेदनशीलता व विकलांगों के साथ सरकार के इस कठोर रवईये की निंदा की है।

देश भर में सरकार के प्रति विकलांगों की नाराजगी व विरोध को देखते हुए खबर अब ये है की इस टैक्स को मात्र 5 फीसदी करने पर सरकार विचार कर रही है। आयकर विभाग के एक अधिकारी के मुताबिक़ टैक्स का प्रावधान इन उपकरणों के मैन्युफैक्चर निर्माताओं पर लगाया जा रहा है। लेकिन इसका सीधा अर्थ यही है की जब उन पर टैक्स लगाया जाएगा तो स्वतः ही उसकी कीमत वे उपभोक्ता से ही वसूलेंगे।

वहीँ वित्त मंत्रालय की और से खबर ये है की सभी टेक्नीकल व कृत्रिम उपकरणों पे केवल 5% टैक्स ही लिया जाएगा।

पर सवाल ये है की 5% भी क्यों। जो उपकरण अभी तक टैक्स मुक्त थे और जो किसी के सहायक मात्र ही नहीं बल्कि एक विकलांग व्यक्ति का सहारा भी होते हैं, उन पर सब्सिडी देने की बजाय सरकार जीएसटी क्यों वसूल रही है?

अभी तक सरकारें ऐसे उपकरणों को विकलांगों को निशुल्क वितरित करतीं थीं अब उन्हीं को इस बिल के दायरे में लाया जा रहा है।

एक तरफ, सरकार विकलांगों को ‘दिव्यांग’ कहकर सहानुभूति प्रकट करती है, तो दूसरी तरह सहायक उपकरणों पर सब्सिडी देने की बजाए, जीएसटी के रूप में अतिरिक्त आर्थिक बोझ थोप रही है।

दुर्भाग्य है कि इस निर्णय के खिलाफ विकलांगों  को स्वयं सड़क  पर उतर कर विरोध जताना पड़ रहा है। देश में सार्वजनिक स्थानों पर विकलांगों  के लिए सुविधाएं नदारद हैं दूसरी तरफ जरूरतमंदों का एक हिस्सा आज भी सरकारी सुविधाओं से वंचित है।

जिस तरह सरकार अब तक विकलांगों के समावेशीकरण व आत्मनिर्भरता हेतु अनेक योजनाएं संचालित करने के प्रयास करती आई है, क्या सरकार विकलांगों  के लिए जीएसटी मामले में किसी तरह की उदारता दिखा पाएगी? बेहतर होगा कि विरोध कर रहे लोगों की भावनाओं को ठेस पहुंचाने के बजाय कुछ राहत देकर जीएसटी को व्यवहारपरक बनाया जाए।

लेख – धीरू यादव 

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