भारतीय मेनस्ट्रीम मीडिया घुटनों पर आ चुकी है। श्रीदेवी की मौत को तीन दिन हो चुके हैं लेकिन भारतीय मीडिया अब भी श्रीदेवी से बाहर नहीं निकल पाया है। ये मीडिया का घिनौना चरित्र है। वो दर्शकों के माध्यम से पैसा कमाता है लेकिन खबर अपनी सुविधा के मुताबिक चलाता है।

देश में कई जरूरी मुद्दे हैं जिसे मीडिया छूना भी नहीं चाहती है, जैस- बिहार में भाजपा नेता द्वारा नौ बच्चों को कुचले जान की खबर, पीएनबी घोटाले में फंसे नीरव मोदी की खबर, जज लोया की संदिग्ध मौत की खबर, केरल में आदिवासी समुदाय के मधु की हत्या की खबर।

ऐसे कई खबरें है जो अभी ताजा चल रही है लेकिन टीवी मीडिया उसे दिखा नहीं रही है। श्रीदेवी की मौत पर अब बीजेपी नेताओं का बयान भी आने लगा है, यानी सरकार मन बना चुकी है कि अब श्रीदेवी के मुद्दे से बाकी सभी मुद्दे को ढक देना है।

मीडिया के इस चरित्र की व्याख्या करते हुए वरिष्ठ पत्रकार दिलीप मंडल ने लिखा है कि ‘मीडिया की एजेंडा सेट करने की ताकत का अध्ययन करने के लिए श्रीदेवी का मामला बेहतरीन केस स्टडी है।

“मीडिया कई बार यह तय नहीं कर पाता कि आप किस तरह सोचें, लेकिन मीडिया अमूमन हर बार यह तय करता है कि आप किस बारे में सोचें।”

आप किसी बात पर पक्ष या विपक्ष में हो सकते हैं, लेकिन सोचना किस बारे में है, यह अक्सर मीडिया ही तय करता है। मीडिया पर जिनका कंट्रोल है, वही आपके लिए मुद्दे तय करते हैं। आपको भ्रम है कि आप सोचने के लिए स्वतंत्र हैं। भारतीय मीडिया शहरी हिंदू सवर्ण इलीट पुरुषों के कंट्रोल में है। Agenda Setting Theory of Media”

दिलीप मंडल मीडिया पर कॉरपोरेट मीडिया दलला स्ट्रीट, मीडिया का अंडरवर्ल्ड, चौथा खंभा प्राइवेट लिमिटेड जैसी किताबे लिख चुके हैं।

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