आज एक लड़की सेल्फी के लिए ज़िद करने लगी। मैं कई लोगों के साथ सेल्फी खींचाते खींचाते चिढ़ सा गया था। उसे सेल्फी न देने के इरादे से सवाल करने लगा। पहले मेरे सवाल का जवाब दो। मैं कौन हूँ ? कहाँ देखा है? क्यों देखती हो? लड़की ने नाम से लेकर सारे जवाब सही दिये। मैं तब भी सेल्फी देने को टालता हुआ सवाल करने लगा। ध्यान ही नहीं रहा कि मैं किस उम्र की लड़की से बात कर रहा हूँ न उसने ऐसा लगने दिया कि उसकी उम्र क्या है।

अगला सवाल पूछा कि क्यों न्यूज देखती हो?

जवाब मिला कि हमें सूचना चाहिए। नहीं तो हमें पता नहीं चलेगा कि दुनिया में क्या हो रहा है।

क्या तुम सूचना और डिबेट में फर्क कर पाती हो ?

हाँ,सूचना ज़रूरी है,डिबेट से समझ बनती है कि इस सूचना का इस्तमाल क्या है।

क्या तुम मानती हो कि पत्रकार को सरकार से सवाल करना चाहिए?

हाँ,पत्रकार सवाल नहीं करेगा तो हमें कुछ पता नहीं चलेगा।

अगर मैं सरकार से कई तरह के लाभ ले लूँ।पुरस्कार ले लूँ।सुरक्षा ले लूँ। तीन चार पीढियों का इंतज़ाम कर लूँ।फिर सरकार की तारीफ करूँ तो तुम देखोगी?

नहीं,मैं तब नहीं देखूँगी।

तुम्हें लगता है कि पत्रकार सवाल कर रहे हैं?

नहीं।

तुम्हें क्या फर्क पड़ता है?हम क्यों ये जोखिम लें? कई पत्रकारों को लगता है कि सरकार से सवाल करना पब्लिक को पसंद नहीं क्योंकि पब्लिक सरकार की दीवानी है।

सर,मुझे फर्क पड़ेगा।आप प्लीज ऐसा मत करना।कोई पुरस्कार मत लेना।दूसरे पत्रकार को भी नहीं करना चाहिए।

क्या तुम फर्क कर पाती हो?कौन सवाल कर रहा है,कौन प्रचार कर रहा है?

हाँ,मैं प्रचार गुणगान करने वाले पत्रकार या चैनल को नहीं देखूँगी ।

तुम्हारे लिए सवाल पूछना क्यों ज़रूरी है?

इस सवाल के बाद लड़की थोड़ी आक्रामक होती है। आक्रामक की जगह अंग्रेज़ी का शब्द FIRM उपयुक्त होगा। उसका जवाब आता है कि आप सवाल करेंगे तभी तो हमें पता चलेगा न कि कौन सी न्यूज सही है। सरकार को जवाब देना पड़ेगा तभी हमें लगेगा कि सरकार सही है।

शाबाश।चलो सेल्फी ले लो। मुझे सेल्फी देनी पड़ी और बहुत दिनों बाद गर्व से सेल्फी खिंचाया। ख़ुद पे गर्व नहीं हुआ। उस लड़की पे गर्व हुआ। मुझे लगा कि मैं कॉलेज जाने वाली लड़की से बात कर रहा हूँ।

वैसे तुम किस क्लास में पढ़ती हो?

इस बार उसकी माँ ने जवाब दिया कि सेवेंथ में पढ़ती है।मुझे इलेवेंथ सुनाई दिया। लड़की ने करेक्ट कर दिया कि सातवीं में पढ़ती हूँ ।

सातवीं में? सेवेंथ में?

यस सर।

उसने बताया कि दिल्ली के जनकपुरी के एक स्कूल की छात्रा है।कम उम्र के कारण उसकी पहचान ज़ाहिर नहीं करना चाहता।मैंने इसकी इजाज़त भी नहीं ली थी मगर ख़ुद से यही दुआ करूँगा कि उसका नाम कभी न भूलूँ।वो अपनी मौसी के घर ग़ाज़ियाबाद आई थी।मुझे किसी मॉल में मिल गई।

अच्छी शिक्षा देने के लिए स्कूल,शिक्षक और माँ बाप को भी बधाई। जब मैं सवाल जवाब कर रहा था तब उसकी माँ और मौसी साँस रोक कर खड़ी थीं कि उसकी बेटी जवाब दे पा रही है या नहीं। न्यूज़ वाला पूछ रहा है,पता नहीं क्या बोल रही है। जैसे ही मैंने कहा कि आपकी बेटी बहुत क़ाबिल है तो माँ और मौसी के चेहरे खिल उठे।

मुझे रोज़ ऐसे जवाब कई लोगों से मिलते हैं। मैं ऐसे जवाबों का आदी हो चुका हूँ। आम लोग से लेकर इंजीनियर,डॉक्टर,दुकानदार हर तबके के लोग ये बात कहते हैं।पत्रकार से यही उम्मीद करते हैं कि वो सरकार को कसौटी पर कसे लेकिन यह हो नहीं रहा है।लोग आराम से चैनलों और पत्रकारों का नाम लेकर बोलने लगे कि वो तो जी गुण ही गाता रहता है।इस जांच से आम तौर पर अखबारों के संपादक बच जाते हैं मगर आम जनता उनके अख़बार का नाम लेने लगी है।एक दिन राजन चरित लिखने वाले संपादकों के बारे में भी लोगों को पता चल जाएगा। नोटबंदी के दौरान एक पाठक ने ही पूछा कि अमुक अख़बार का संपादक कौन है? हिन्दी अख़बार रोज़ पहले पन्ने पर सरकार का गुणगान छापता है और भीतर के पन्ने पर आम जनता की परेशानी।

मैंने ये कहानी क्यों लिखी? उन पत्रकारों को यक़ीन दिलाने के लिए कि जनता सरकार और पत्रकारिता के दायित्व में फर्क करती है।जो लोग पत्रकारिता के मूल कर्तव्य की याद दिलाते हैं,उनमें से ज़्यादातर सरकार को चुनने वाले ही होते हैं। यह सही है कि राजनीतिक नियंत्रण,संस्थान,संपादक,मानव और आर्थिक संसाधनों के कारण पत्रकारिता अब बंद होती जा रही है।हो सकता है कि हम सब इसके शिकार हो जाएँ।इसलिए मौका मिलते ही पत्रकारिता कीजिये और अपने स्तर पर पत्रकारित के मौके बनाइये। बाक़ी नौकरी तो कभी हम लोगों के हाथ में नहीं रहेगी। शायद यह कहानी इसलिए लिखी कि जनता को मत दोष देना कि वो पत्रकारिता पसंद नहीं करती है। उसे पत्रकारिता और चरण वंदना में फर्क पता नहीं।आज शाम एक ऐसे ही प्रौढ़ पाठक ने पूछा कि अच्छे पत्रकार ग़ायब क्यों कर दिये जाते हैं?नौकरी से क्यों हटा दिये जाते हैं?हम तो चैनल का कनेक्शन ही कटवाने की सोच रहे हैं ।

तो दोस्तों,ऐसा नहीं है कि कोई नहीं है। क्या यह अच्छा नहीं कि कोई है।सातवीं क्लास की बच्ची की बात बताती है कि नौजवानी की दहलीज़ से दूर हमारे बच्चे भी भांड पत्रकारिता पकड़ लेते हैं। इससे सरकारों की भी छवि ख़राब हो रही है।इसलिए उन्हें भी सलाह दे रहा हूँ कि भांड पत्रकारों से दूर रहें। सख़्त सवालों का सामना करें। बिना तय किये हुए इंटरव्यू देने का साहस पैदा करें और सवालों का जवाब दें न कि नैतिक उपदेश। जब सातवीं की लड़की यह खेल समझने लगी है तो भरोसा रखना चाहिए कि बहुतों को यह खेल पता चल गया है। भारत के लोकतंत्र को लेकर जो लोग दिन रात डरे रहते हैं,एक सलाह उनके नाम भी। भारत के लोगों से मिला कीजिये। भारत वह नहीं है जहाँ ऑनलाइन गुंडे रहते हैं। जब तक सातवीं की उस बच्ची के ज़हन में सवालों को लेकर सवाल है,सवालों का जलवा कायम है।