देश में लगातार हो रहे बैंक घोटालों के कारण बैंकों का एनपीए (बैंकों का वो कर्ज़ जो उन्हें वापस नहीं मिलता या डूब जाता है) बढ़ता जा रहा है। अब ये इतना बढ़ गया है कि अगर देश का हर व्यक्ति इसे चुकाना चाहे तो उसे हज़ारों रुपये देने होंगे।

बैंकों का ये बढ़ता एनपीए उस पूंजीवादी व्यवस्था की कहानी बयान करता है जिसमें उद्योगपतियों को संसाधन मुहैय्या कराए जा रहे हैं और उसके लिए वसूली आम जनता से की जा रही है।

भारतीय बैंकों पर सितंबर 2017 तक नॉन परफॉर्मिंग एसेट (एनपीए) या डूबत कर्ज़ 8.29 लाख करोड़ रुपए पहुंच गया है। यानी यह बैंकों द्वारा बांटे गए कर्ज़ का वो पैसा है जिसकी रिकवरी की संभावना नहीं है।

आसान भाषा में समझें तो यह इतना पैसा है कि देश की 133 अरब आबादी से अगर इस पैसे की वसूली की जाए तो हर शख्स को 6,233 रुपए देने होंगे। यानि कि माल्या और नीरव मोदी जैसे भगोड़ो की वजह से इस समय देश का हर व्यक्ति कर्ज़दार बन चूका है।

ऑल इंडिया बैंक ऑफिसर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष एस सिसोदिया कहते हैं कि एनपीए में बड़े उद्योगों का हिस्सा करीब 70 फीसदी है।

उन्होंने कहना है कि बैंक तो आम आदमी को दिए लोन की आमदनी से चल रहे हैं। उद्योगों को 4 से 6% की दर पर लोन मिलता है और आम आदमी को 8 से 15% तक की दर पर। उद्योगों को दिए 100 रुपए के कर्ज़ में 19 रुपए डूब रहे हैं तो आम आदमी के महज़ 2 रुपए। वो भी बाद में वसूल हो जाते हैं।

मतलब बैंक व्यवस्था चलाने में योगदान आम जनता दे रही है। लेकिन बैंक हज़ारों करोड़ का कर्ज़ उद्योगपतियों को दे रहे हैं। वो उद्योगपति वो कर्ज़ लेकर आराम से विदेश भाग रहे हैं लेकिन बैंक से लेकर सरकार तक कुछ नहीं कर पा रही है। वहीं एक किसान अगर अपना कुछ हज़ारों का भी कर्ज़ न चुकाए तो उसके खेत से लेकर घर तक पर कब्ज़ा कर लिया जाता है।

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