सत्ता पर सवाल खड़े करते हुए पाकिस्तानी जनकवि हबीब जालिब ले लिखा था… ‘वो (सत्ताधारी) कहते हैं सब अच्छा है मगरिब का राज़ ही सच्चा है, गरीब भला ये क्यों माने जब भूखा उसका बच्चा है।’

हबीब जालिब की ये रचना भारत में आज भी प्रासंगिक है। सत्तानसी नरेंद्र मोदी की माने तो देश के अच्छे दिन चल रहे हैं, लेकिन कर्ज से आत्महत्या करता किसान, बेरोजगारी से दर बदर भटकता नौजवान और बलात्कार से जूझती महिलाएं पीएम के इस सपने पर कैसे यकीन करे?

पिछले दिनों महाराष्ट्र के 35,000 किसान और आदिवासी नासिक से 180 किलोमीटर का पैदल मार्च करते हुए मुंबई के आज़ाद मैदान में पहुंचे थें। किसान सरकार से गुहार लगा-लगाकर थक चुके थे, अंत में सरकार का ध्यान अपनी समस्याओं की तरफ खिचने के लिए उन्हें इतना लंबा पैदल मार्च करना पड़ा।

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इस दौरान कई किसानों के पैर खून से लथपथ हो गए थें, कई किसानों के पैर का चमरा अलग हो गया था, कई किसान गंभिर रूप से बीमार हो गए थें। किसान संविधान और कोर्ट द्वारा मिले अपने अधिकार को मांग रहे हैं। उनकी मांग है

– वन अधिकार कानून, 2006 सही ढंग से लागू हो
– स्वामीनाथन आयोग की सिफ़ारिशों को लागू किया जाए
– सरकार कर्ज़ माफ़ी के वादे को पूरी तरह से लागू करे

ये तीनों मांगे ऐसी हैं जिसे सरकार को बहुत पहले लागू कर देना चाहिए था लेकिन सरकार अब भी मौन है। क्या किसानों की इस पीड़ा और समस्या को ही पीएम मोदी अच्छे दिन कहते हैं?

किसानों की तरह छात्र भी आंसू बहा रहे हैं। वो अपनी शिक्षा, परीक्षा और रोजगार के लिए हर रोज कही न कही पुलिस की लाठियां खा रहे हैं। अभी गत शुक्रवार, 23 मार्च को दिल्ली पुलिस ने जेएनयू छात्रों के ‘शांतिपूर्ण प्रदर्शन’ पर लाठीचार्ज कर दिया था।

जेएनयू के छात्र और प्रोफेसर यूनिवर्सिटी में 75 फीसदी उपस्थिति अनिवार्यता के विरोध, छेड़छाड़ के आरोपी प्रोफेसर अतुल जौहरी के खिलाफ कार्रवाई समेत अन्य मांगों को लेकर संसद तक मार्च निकाल रहे थे। तभी आईएनए के पास पुलिस ने रोका और जमकर लाठीचार्ज किया। क्या पीएम मोदी छात्र-छात्राओं पर लाठी बरसाने को अच्छे दिन कहते हैं?

छात्र और किसान तो अपनी समस्या को लेकर प्रदर्शन भी कर पा रहे हैं लेकिन देश की सुरक्षा करने वाले जावन तो घूट-घूटकर जीने को मजबूर हैं। 2014 में छत्तीसगढ़ के सुकमा नक्सली मुठभेड़ में घायल सीआरपीएफ़ के जवान मनोज सिंह तोमर पिछले चार साल से अपनी आंत पॉलीथीन में रखकर इलाज की आस लगाए भटक रहे हैं।

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16 साल तक सेना में रहकर देश की सेवा करने वाले मनोज सिंह तोमर अब बहुत दुखी हैं। क्योकि नक्सली हमले में घायल होने के बाद सरकार उनकी पूरी चिंता नहीं कर रही है। बता दें कि मनोज तोमर को इलाज के लिए केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह के द्वारा 5 लाख रुपए देने का आश्वासन दिया गया था, लेकिन आज तक उन्हें मदद नहीं मिली। क्या जवानों की ऐसी दिल दहला देने वाली स्थिति को पीएम अच्छे दिन कहते हैं?

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