नेशनल अवार्ड विनर फिल्ममेकर प्रकाश झा का कहना है की हमारी फिल्मों में सेंसरशिप नहीं होनी चाहिए। झा ने कहा की फिल्मो को सेंसर यानी फिल्म के सीन की काट-छाट नहीं करनी चाहिए| झा ‘लिपस्टिक अंडर माई बुर्का’  के प्रोडूसर है, ये वही फिल्म है जिसे लेकर सेंसर बोर्ड से सीधे टकराव के बाद प्रोडूसरो को  अदालत का दरवाज़ा खटखटाने की नौबत आ पड़ी थी|  हालाँकि फिल्म ट्रिब्यूनल में गुहार के बाद सेंसर बोर्ड ने फिल्म  को ए सर्टिफिकेट देने के बाद रिलीज़ करने की मंजूरी दे दी |फिल्म की कहानी चार ऐसी महिलाओं के इर्द-गिर्द घूमती है, जो अपनी जिंदगी खुलकर जीना चाहती हैं।
प्रकाश झा ने सेंसर बोर्ड के बारे में बात करते हुए कहा ‘यह अपने आप में एक बात है कि लोगों का एक समूह यह फैसला करेगा कि बाकी देश को क्या देखना है और क्या नहीं’। हम लोकतांत्रिक देश हैं,  तो फिर यह कैसे हो सकता है? झा ने कहा की दर्शक ही सबसे बड़ा होता जज हैं और वो जानता है उन्हें क्या देखना चाहिए और क्या नहीं ।
प्रकाश झा ने कहा ये सब उनके लिए अब आम बात हो गयी है और  इन सब बातो से उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता| प्रकाश झा को  इससे पहले भी गंगा जल और राजनीति  जैसी फिल्मो के लिए सेंसर बोर्ड से  काफी जद्दोजहद करनी पड़ी थी|
उन्होंने कहा कि यह दुर्भाग्य कि बात है कि हमारे समाज में एक महिला को बुनियादी चीजों जैसे कपड़ों, भोजन और व्यवहार को लेकर पुरुषों की सोच के हिसाब से रहना पड़ता है।
ये पहली बार नहीं हुआ है जब सेंसर बोर्ड को  किसी फिल्म के सीन से आपत्ति हो|  साल 2016 में  अनुराग कश्यप और बालाजी प्रोडक्शन में बनी फिल्म उड़ता पंजाब को लेकर भी  काफी बवाल हुआ था|
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