गुजरात विधानसभा चुनाव के परिणाम आ गए हैं। राज्य में भाजपा और कांग्रेस के बाद जिसको बड़ी संख्या में वोट पड़े हैं वो है ‘नोटा’। बता दें, कि नोट को लगभग पांच लाख वोट मिले हैं। ये मतदाता को मिला एक ऐसा विकल्प है जिसे वो तब प्रयोग करते हैं जब उसे किसी भी पार्टी से कोई उम्मीद नहीं होती।

यूं तो वर्तमान में देश की राजनीति में नैतिकता जैसी कोई चीज़ नहीं बची है लेकिन अगर नैतिक नज़रिए से देखा जाए तो ये देश की राजनीतिक पार्टियों के लिए चिंता का विषय है।

समाज के बीच हताशा इतनी बढ़ चुकी है कि लोग किसी भी राजनीतिक पार्टी से कोई उम्मीद नहीं रखते हैं। प्रधानमंत्री मोदी को भी इस बात की गंभीरता को समझना चाहिए। एक तरफ वो गुजरात को देश का सबसे तथाकथित विकसित राज्य होने का दावा करते हैं और दूसरी तरफ हालात ये हैं कि उसी राज्य के लोग अपने प्रतिनिधियों से नाउम्मीद हो गए हैं।

‘नोटा’ का इतना ज़्यादा चुना जाना बताता है कि देश के लोकतंत्र में लोगों विश्वास कमज़ोर हो रहा है। देश में बढ़ती आर्थिक असमानता और विकास के नाम पर धार्मिक प्रचार ने इस स्तिथि को जन्म दिया है। आज अगर इस ‘नोटा’ दबाने वाली जनता से कोई देश की बात करे तो वो न उत्साहित दिखेंगें और न ही गंभीर। क्योंकि उनके मुताबिक इस देश ने उन्हें उतना भी नहीं दिया कि वो चुनाव में भरोसा बनाए रख सके।

तो देश की राजनीति जनता की हताशा तो बढ़ा ही रही है साथ ही देश के प्रति उनके जज़्बे को भी खत्म कर रही है।

Loading...
loading...