दिवाली के मौके पर हर चौराहा, हर दुकान, हर घर रोशन है। भारत विविधताओं से भरा देश है यहाँ आस्था के आगे सब एक हो जाते है।

ऐसा ही नज़ारा देखने को मिलना दिल्ली के हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया की दरगाह पर दिवाली के मौक़े पर दीपमाला सजी, रंगोली भी रचाई गई है। हजरत निज़ामुद्दीन औलिया की दरगाह पर जहां लोगों ने दीप जलाकर दिवाली पुरे देश में एक सन्देश दिया है।

आज जहां एक तरफ नफरत हर तरफ देखी जा रही है। लोग भीड़ का शिकार होकर मार दिए जा रहे है। इतिहास बदलने की बात की जा रही हो उसी के बीच दिवाली का त्यौहार आना और एक दूसरे को ये सन्देश देना की दिवाली किसी एक धर्म की नहीं ये सबकी दिवाली है। क्योकिं ये बुराई पर अच्छाई की जीत है।

दरगाह पर दीप जलाकर जो मिसाल पेश की गई उससे वसीम बरेलवी की कही बात को सच साबित करती है। वो ये कि हिंदुस्तान की सरजमीं ज्यादा दिन तक नफरत बर्दास्त नहीं कर सकती।

इतने सालों में हजरत निज़ामुद्दीन औलिया की दरगाह ने भारत की तक़दीर को बनते बिगड़ते देखा। जिनमें से सबसे अच्छें वक़्त में शायद आज का दिन दिवाली का दिन हो। जहां इतनी नफ़रत होने के बावजूद लोगों ने दीया जलाकर अमन का पैगाम दिया है।

खुद निजामुद्दीन औलिया बड़े ही खुले दिल के विचारक और हर मज़हब को एक ही नज़र से देखने वाले थे। दरअस्ल, सूफ़ीवाद का सिर्फ एक ही सिद्धांत है। इंसान चाहे किसी भी मज़हब, जाति या रंग का हो, सभी की सेवा करना।

सूफ़ी एक बात मानते हैं। ‘अल खल्क-औ-अयालुल्लाह।’ माने सब खुदा के बंदे हैं और ख़ुदा से इश्क तभी है जब उसके अयल यानी बंदों से है।

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