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अभिव्यक्ति से गठबंधन की असुविधा में हूँ

किस तरह हाल ये बयाँ करूँ मैं इस दुविधा में हूँ।

क्या वर्तमान की बात मानकर खड्ग धर लूँ मै

या फिर कलम को खड्ग बना लूँ मैं इस दुविधा में हूँ।

 

“माँ वो बड़े घर वालों ने थोडा खाना बाहर फेंक दिया था, तुम छोटी को दे दो, उसका जन्मदिन है न आज”

 

भूखी झोपड़ियों से जब भी ये बोल सुनाई पड़ते हैं,

तब हरित-क्रांति के खंडहर से ये शंखनाद हम करते हैं,

उस बीपीएल वाली कोठी से छोटी झोपड़पट्टी तक,

किस तरह समानता रूठ गयी है, मैं इस दुविधा में हूँ।

 

जहाँ ‘माँ-बहनों’ की गाली देना आधुनिकता का परिचय समझा जाता हो

जहाँ अखबारों का पहला पन्ना बेटी के खून से रंगा जाता हो,

और फिर भी बेटी को ही इज़्ज़त के रथ का वाहक समझा जाता हो,

जहाँ बलात्कारी की लघुत्तम आयु केवल नौ वर्ष बतायी जाती हो,

मैं किस मुँह से भारतीयता पर नाज़ करूँ मैं इस दुविधा में हूँ।

 

“माँ काश आज मैं बीमार होता, तो तू शायद मुझे स्कूल ना भेजती…”

पेशावर के लहू के छींटे ये बोल सुनाया करते हैं,

छोटे-छोटे कब्र के ताबुत माँ के छलनी सीने का हाल बताया करते हैं,

जहाँ कश्मीर की कीमत हमको कटे हुए सर देकर चुकानी पड़ती है,

वहाँ बर्बरता से बैर करूँ या मैं खुद ही बर्बर बन जाऊँ

किस तरह विनाश का नाश करून मैं, मैं इस दुविधा में हूँ।

 

यहाँ मृत्युशैया पर बैठी नैतिकता हर रोज़ ठिठोली करती है,

उन ज़ंजीरों के पीछे से मानवता चीख गर्जना करती है

पत्थर के टीलों में जो ईश्वर की स्तुति करते हैं,

माँ-बाप को नर्क बताकर वो ही दोज़ख में आँहें भरते हैं

किस तरह अंत का विगुल बजाऊं मैं इस दुविधा में हूँ

किस-किस दुविधा का गान करूँ मैं इस दुविधा में हूँ।

 

 

कीर्ति दहिया  छात्रा,

केशव महाविद्यालय (डी.यू.)

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