अंग्रेजों को हिला देने वाले काकोरी कांड के नायक और ‘हसरत’ उपनाम से उर्दू के उम्दा शायर अशफाक उल्लाह खां शहीद राम प्रसाद बिस्मिल के सबसे भरोसेमंद साथी थे।

फांसी की सजा सुनाए जाने के बाद उन्होंने कहा था – बिस्मिल हिन्दू हैं। कहते हैं – ‘फिर आऊंगा, फिर आऊंगा; ले नया जन्म ऐ भारत मां, तुझको आजाद कराऊंगा।’

जी करता है मैं भी ऐसा कहूं, पर मजहब से बंध जाता हूं। मैं मुसलमान हूं, पुनर्जन्म की बात नहीं कह पाऊंगा। हां, खुदा अगर मिल गया कहीं तो अपनी झोली फैला दूंगा और जन्नत के बदले उससे एक नया जन्म ही मांगूंगा।’

19 दिसंबर, 1927 की सुबह फांसी पर चढ़ने के पहले वजू के बाद उन्होने कुछ आयतें पढ़ी, कुरआन को आंखों से लगाया और ख़ुद जाकर फांसी के मंच पर खड़े हो गए।

उन्होंने वहां मौज़ूद लोगों से कहा – ‘मेरे हाथ इन्सानी खून से नहीं रंगे हैं। खुदा के यहां मेरा इन्साफ़ होगा।’ उन्होंने अपने हाथों फांसी का फंदा गले में डाला और झूल गए।

साभार – ध्रुव गुप्त