पिछले 25 सालों से एक मुद्दा देश में बना हुआ है वह है राम मंदिर और बाबरी मस्जिद। क्योंकि बीते रोज 6 दिसंबर था तो न्यूज़ चैनलों के प्राइम टाइम और डिबेटों में ज्यादातर यहीं मुद्दा छाया रहा और मीडिया इस मामलें में मीडिया कम और बीजेपी की प्रवक्ता के रूप में ज्यादा नज़र आ रही थी। एक दो चैनलों को छोड़ दिया जाये तो शायद ही ऐसा कोई चैनल हो जिसने कपिल सिब्बल के बयान पर बहस न कराई हो।

देश के एक सूबे में जब चुनाव होने है तो मीडिया सारें अहम मुद्दों को छोड़कर सभी राम मंदिर और मस्जिद के विवाद को हवा देने में लग गया। हर पक्ष से एक लोग बैठाकर बहस शुरू होने लगी चाहें वो आजतक का दंगल हो या फिर न्यूज़ 18 का हम तो पूछेंगें डिबेट शो ऐसा लग रहा था

मानो फैसला सुप्रीम कोर्ट नहीं न्यूज़ चैनल ही सुना देंगे। आज मीडिया की नज़र में खबरियां चैनलों की चर्चाओं पर चर्चा कर बतायेंगें कैसे चुनाव का मुद्दा आज भी मंदिर-मस्जिद के बीच अटका पड़ा है।

न्यूज़ 18 के चर्चित डिबेट शो हम तो पूछेंगे में जिस विषय पर चर्चा हो रही थी वो था तम्बू में रामलला कब तक?

विषय का नाम ऐसा जिसमें लग रहा था बात अब सिर्फ एक पक्ष की रखी जायेंगी दूसरे पक्ष को सुनने में या उनकी बात टॉपिक में रखने का मतलब नहीं होता है। डिबेट में बुलाया तो हर पक्ष को गया मगर सुना सिर्फ एक जा रहा था जैसा आमतौर पर होता है टीवी न्यूज़ में।

इंडिया टीवी : यहां तो बकायदा प्रधानमंत्री मोदी का भाषण चलाया गया जिसमें दिखाया गया की कैसे प्रधानमंत्री मोदी ने कांग्रेस पर राममंदिर मामलें में कपिल सिब्बल से जवाब मांगने के बजाय कांग्रेस से सवाल मांग रहे थे। उसके बाद गुजरात चुनाव में पोलिंग सर्वे दिखाया गया जिसमें बीजेपी को ज्यादा सीट दिखाई गई।

आजतक के दंगल में भी राममंदिर के मुद्दे पर चर्चा हुई इनका भी उद्देश वही था बस विषय की जगह सवाल पूछें जा रहे थे और सवाल कुछ इस प्रकार थे। जब कांग्रेस पार्टी राम मंदिर पर खुलकर बोल रही है तो राहुल गाँधी इस बारें में चुप क्यों है।

ऐसा लग रहा था जैसे राहुल गाँधी नहीं प्रधानमंत्री हो चुप हो इस मामलें पर और राहुल गाँधी पर सवाल खड़ा करने से क्या मिलेगा ये जान पाना भी अपने आप में एक रहस्य की राममंदिर मामलें पर राहुल गाँधी का बोलना ज्यादा अहम है या सुप्रीम कोर्ट जो रोज ब रोज अब इस मामलें में सुनवाई करेगी।

आखिर में एनडीटीवी का प्राइम टाइम जो दिखता कैसे टीआरपी रेटिंग की बिना फ़िक्र किये असल मुद्दे पर चर्चा हो सकती है। चाहे वो खस्ताहाल कॉलेजों पर रिपोर्ट दिखाना हो या फिर अब सिस्टम से सवाल करना रविश कुमार के प्राइम टाइम में बताया की बाबरी मस्जिद की घटना हमारे सिस्टम के बड़े स्तर पर फेल होने और आज तक फेल होते रहने का सबसे शर्मनाक और अचूक उदाहरण है।

जब सिस्टम फेल होता है तब क्या होता है, तब यही होता है कि एक नागरिक कमज़ोर हो जाता है। वो अपने इंसाफ़ की लड़ाई के लिए दर दर भटकने लगता है। आपने कितने दिनों से नहीं पूछा कि थाने अपना काम ईमानदारी से कर रहे हैं या नहीं, पुलिस और अदालतों की प्रक्रिया इंसाफ हासिल करने वालों के लिए आसानी से उपलब्ध है या नहीं।

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