क्या है पनामा मामला-

पाकिस्तान की सुप्रीम कोर्ट ने प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ को पनामा पेपर्स मामले में दोषी पाया है और उन्हें इस्तीफा देना पड़ा है। पनामा पेपर्स का मामला भारत में भी आया लेकिन कुछ नामों को देख सबने कन्नी काट ली। पाकिस्तान की कोर्ट को बधाई देने के चक्कर में यहां भी बात उठेगी कि जब भ्रष्टाचार को लेकर सरकार तक बदल जा रही है तो पनामा और सहारा पेपर्स को लेकर सब चुप क्यों रह गए। आप गूगल में सहारा पेपर्स और प्रशांत भूषण टाइप कीजिएगा, काफी कुछ निकलेगा।

उत्तरी और दक्षिणी अमेरिका के बीच में पड़ता है पनामा शहर। इस पनामा पेपर्स से उजागर हुआ है कि दुनिया के 72 मौजूदा या पूर्व हो चुके राष्ट्र प्रमुखों ने फर्ज़ी कंपनी बनाकर अपना पैसा यहां रखा है। 500 से अधिक भारतीयों के नाम हैं पनामा पेपर्स में। अप्रैल 2016 में इंडियन एक्सप्रेस ने इस पर कई रिपोर्ट प्रकाशित की थी। हंगामा हुआ तो सरकार ने एक्सप्रेस की तारीफ करते हुए जांच के आदेश दे दिये लेकिन 16 से 17 आ गया इस जांच का कहीं कोई अता-पता नहीं है। अंजाम तो छोड़ ही दीजिए।

मई 2017 में इंडियन एक्सप्रेस ने एक फोलोअप स्टोरी छापी थी कि 424 लोगों के खिलाफ जांच हो रही है। 49 लोगों के ख़िलाफ़ प्रत्यर्पण विभाग ईडी जांच कर रहा है। पनामा पेपर्स में 100 के करीब दिल्ली के थे और इतने ही मुंबई के। एक्सप्रेस अखबार ने ऐश्वर्या राय का नाम भी एक संदर्भ में लिया है लेकिन उनकी टीम ने इसे बेबुनियाद बताया है। और भी कई नाम हैं, अमिताभ बच्चन से लेकर अडानी के बड़े भाई, हरीश साल्वे, इंडिया बुल्स के समीर गहलोत, इकबाल मिर्ची। इनमें से कुछ ने अपनी सफाई देते हुए इन बातों को बेबुनियाद बताया है।

जर्मनी के म्यूनिख से निकलने वाले अख़बार ज्युड डॉयचे त्साइटुंग को सूत्रों के ज़रिये पनामा शहर की एक कंपनी मोसाक फोंसेका के एक करोड़ से अधिक ईमेल और पीडीएफ फाइल मिलती है। मोसाक फोंसेका एक कानूनी सेवा देने वाली कंपनी है जिसका काम कंपनियों की खरीद बिक्री में मदद करना है। आरोप है कि 1977 में बनी इस कंपनी ने कई फर्ज़ी कंपनियों को बिकवाने का खेल खेला है जिसके ज़रिये दुनिया के बड़े लोगों ने अपना पैसा अपनी सरकार से छिपा कर पनामा में जमा कराया है ताकि टैक्स न देना पड़े। ज्युड डॉयचे त्साइटुंग अखबार को 1970 के दशक से लेकर 2015 के बीच 2 लाख से अधिक शेल कंपनी यानी काग़ज़ी कंपनियों के दस्तावेज़ मिले हैं। इन्हीं दस्तावेज़ों को पनामा पेपर्स नाम दिया गया है।

लाखों कंपनी और करोड़ों दस्तावेज़ों को पढ़ना आसान नहीं था। इसलिए ज्यूड डॉयचे त्साइटुंग अखबार ने इन दस्तावेज़ों को इंटरनेशनल कॉन्‍सोर्टियम ऑफ इंवेस्टिगेटिव जर्नलिस्‍ट्स (International Consortium of Investigative Journalists) से साझा किया। दुनिया भर के 370 पत्रकार एक साल तक इन दस्तावेज़ों की जांच करते रहे। भारत की तरफ से इंडियन एक्सप्रेस भी शामिल है।।

2008-13 : पुतीन के मित्र ने फर्ज़ी कंपनी बनाकर 2 अरब डॉलर गुप्त ठिकाने पर रखा है। सर्जे रोल्डुगिन नाम का यह मित्र पुतीन के लिए फ्रंट का काम करता है। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री और चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग का नाम आया है। जबकि ये कहा जाता है कि चिनफिंग भ्रष्टाचार पर लगाम कस रहे हैं। कई नेताओं और सैनिक अधिकारियों को गिरफ्तार किया है। फुटबाल खिलाड़ी मेसी का भी नाम आया है।

रायटर्स ने बताया है कि न्यूज़ीलैंड और ऑस्ट्रेलिया के टैक्स प्रशासन ने अपने नागरिकों की जांच शुरू कर दी है। ऑस्ट्रेलिया ने कहा है कि उसके यहां 800 अमीर नागरिकों की जांच शुरू हो गई है। फ्रांस में भी जांच हो रही है। स्वीडन के टैक्स प्रशासन ने भी कहा है कि वो न्यूज संगठनों से दस्तावेज़ लेकर जांच करेंगे। पनामा लिक्स में 400-500 स्वीडन के नागरिकों के भी नाम हैं।

पाकिस्तान में पनामा पेपर्स पर फैसला आने के बाद कई लोग यह सवाल पूछ रहे हैं कि क्या भारत का गोदी मीडिया सरकार से सवाल करेगा और जिनके नाम आए हैं उनके बारे में अभियान चलाएगा। इसका जवाब ना है क्योंकि पनामा पेपर्स में लालू यादव का नाम नहीं है। इसलिए पनामा पेपर्स में जिनके भी नाम आए हैं वो ईमानदार हैं!! बाकी नेताओं ने पनामा पेपर्स पर एक्सप्रेस की रिपोर्टिंग नहीं पढ़ी थी। एक्सप्रेस ने शानदार रिपोर्टिंग की है। पत्रकारिता के छात्रों को गूगल से रिपोर्ट निकालकर पढ़नी चाहिए। मैंने भी प्राइम टाइम के लिए एक्सप्रेस के पत्रकारों के साथ उनके आफिस में बातचीत की थी।

लेखक- रवीश कुमार

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