देश में मीडिया की स्थिति यूं ही नहीं दयनीय हो गई है। पत्रकारिता की पढ़ाई कर रहे छात्रों को ही अब लगाम लगा कर इंडस्ट्री में उतारा जाता है ताकि सिस्टम के खिलाफ आवाज उठाने के बजाय वो जी हुजूरी करते रहें।

भारतीय  जनसंचार संस्थान (IIMC) में पत्रकारिता की पढ़ाई कर रहे छात्र भूख हड़ताल पर बैठे हैं। प्रशासन के मनमानी, झूठ-फरेब और गुंडई के खिलाफ बैठे इन छात्रों की मांग है कि उन्हें ना सिर्फ पढ़ने के लिए लाइब्रेरी, रहने के लिए छात्रावास और लिखने-बोलने के लिए आजादी चाहिए बल्कि आईआईएमसी प्रशासन के झूठ फरेब से भी छुटकारा चाहिए।

छात्रों को न सिर्फ प्रशासन की मनमानी का सामना करना पड़ रहा है बल्कि प्रशासन द्वारा समर्थित कुछ लठैतों का सामना भी करना पड़ रहा है, जो न सिर्फ धमका रहे हैं बल्कि छात्रों के चरित्र हनन के तमाम कोशिशें कर रहे हैं।

प्रशासन की मनमानी के खिलाफ आवाज उठा रहे छात्राओं के चरित्र हनन की कोशिश में तमाम शर्मनाक टिप्पणियां करने वाले, सेक्सिस्ट कमेंट करने वाले कुछ चापलूस छात्र भी भावी पत्रकार हैं, जो प्रशासन को खुश करने के लिए सहपाठियों को बदनाम करने पर उतर आए हैं।

पिछले हफ्ते मामले ने जोर तब पकड़ा जब हिंदी पत्रकारिता के एक छात्र मनदीप सिंह ने प्रशासन की मनमानी और झूठ फरेब के खिलाफ विरोध प्रदर्शन किया, हाथ में पोस्टर लिए हुए खड़े छात्र के साथ कॉलेज में तैनात सुरक्षा गार्डों ने मारपीट की।

इसके बाद एक अन्य छात्र श्याम सिंह भी विरोध प्रदर्शन करने लगा, धीरे धीरे दर्जनों छात्र -छात्राएं वहां एकत्र हो गए।

विवाद बढ़ता देख प्रशासन बैकफुट पर आ गया और ये तसल्ली दिया कि उनकी मांगों को माना जाएगा। छात्रों का आरोप है कि मांग पूरी करने के बजाय प्रशासन ने फिर से वही काम किया जिसके लिए वह कुख्यात रहा है। आश्वासन के बावजूद अपनी बात से पलटकर संस्थान के डायरेक्टर जनरल के जी सुरेश ने खानापूर्ति की, जिससे आंदोलनरत छात्रों को भूख हड़ताल पर जाना पड़ा।

विवाद की जड़ में पुरुष छात्रावास की उपलब्धता का ना होना है- जो पिछले बैच के छात्रों के लिए उपलब्ध था। जुलाई से शुरू होने वाले नए बैच 2017-18 के लिए हॉस्टल को खत्म कर दिया गया था। जिसका बाद में तर्क दिया गया कि लड़कियों की संख्या ज्यादा होने की वजह से दूसरा हॉस्टल भी लड़कियों को उपलब्ध करा दिया गया है।

जब छात्रों को बाद में पता चला कि इस बार छात्राओं की संख्या बढ़ी नहीं है बल्कि घटी , पिछले साल छात्राओं की संख्या 129 थी और इस साल घटकर महज 115 रह गई है; तब प्रशासन के इस झूठ को सामने आ जाने पर छात्र आक्रोशित हो उठे।

प्रशासन का दूसरा तर्क है छात्राओं की सुरक्षा के लिए छात्रों को कैंपस में एक निश्चित समय अवधि के बाद बाहर कर दिया जाता है। यहां तक कि उस संस्थान में अध्ययनरत छात्र भी रविवार को कैंपस में आ नहीं सकते।

इस पर आपत्ति जताने पर हवाला दिया जाता है कि यह महिलाओं की सुरक्षा के लिए जरूरी कदम है जबकि संस्थान की छात्राओं ने इसका खंडन करते हुए कहा कि प्रशासन अपनी नाकामी को छुपाने के लिए छात्राओं की सुरक्षा का हवाला दे रहा है।

कैंपस में छात्रों के होने पर संस्थान की अनियमितताओं पर निगरानी बनी रहती थी इसलिए बहाने से उन्हें कैंपस से बाहर कर दिया गया है।

इसके लिए छात्राओं ने बकायदा मुहिम चलाई कि हमारे नाम पर अपने उल्टे-सीधे फैसले जस्टिफाई करने की कोशिश ना की जाए और इसको नाम लिया #नॉट_इन_माय_नेम

साथ ही लिखा, लड़कों को हॉस्टल क्यों नहीं ?

प्रशासन एक और तर्क देता है कि लड़कों के लिए हॉस्टल नहीं है, ऐसा प्रोस्पेक्टस में उल्लेखित है। लेकिन पिछले बैच के छात्र बताते हैं कि ऐसा हर वर्ष के  प्रोस्पेक्टस में छपा होता है जबकि पिछले वर्ष 2016-17 बैच के छात्रों को भी हॉस्टल मिला था।

लड़कियों को एक छात्रावास से दूसरे छात्रावास में लाकर सिर्फ खानापूर्ति की गई है ताकि लड़कों को हॉस्टल से निकाले जाने को लेकर जस्टिफाई किया जा सके।

सच्चाई यह है कि पिछले साल हॉस्टल में रह रही छात्राओं को कोई दिक्कत नहीं हुई तो इस बार उससे कम छात्राओं को दिक्कत होने का कोई सवाल ही नहीं बनता।

लडकियों की ज्यादा संख्या और सुविधा के हवाला वाले मामले में पड़ताल करने पर पता चलता है कि इसमें प्रशासन सरासर झूठ बोल रहा है। क्योंकि पिछले बैच के एक स्टूडेंट अंकित कुमार सिंह ने जून 2017 में ही इस मामले पर सोशल मीडिया पर लिखा कि लड़कों का हॉस्टल खत्म किया जा रहा है और पुरुष छात्रावास में से पुरुष शब्द मिटा दिया गया है।

दिलचस्प ये है कि जून महीने में तो एंट्रेंस का परिणाम भी नहीं आया होता है तो बिना प्रवेश परीक्षा परिणाम के प्रशासन को कहां से पता चल गया कि छात्राओं की संख्या इस बार ज्यादा होनी है?

छात्राओं की संख्या इस बार ज्यादा के बजाए कम हुई है तो फिर छात्रों से झूठ बोल कर उन्हें हॉस्टल की सुविधा से वंचित क्यों रखा गया ?

तमाम छात्र-छात्राएं पूरे मामले पर बताते हैं कि ‘कोड ऑफ कंडक्ट’ के नाम पर छात्र-छात्राओं को खुलकर अपनी बात रखने से दबाया जाता है।

यहां तक कि निर्देश दिया जाता है कि सोशल मीडिया पर या किसी पब्लिक प्लेटफॉर्म पर आपको प्रशासन की कमियों के बारे में नहीं लिखना है। यानी कि प्रशासन कोई भी मनमानी करता रहे और आप उस पर चुप्पी साधे रहें ।

उसी प्रशासन से विनती और निवेदन करते रहें और वह खुद के ऊपर एक्शन ले या न ले उसकी मर्जी।

छात्रों का कहना है कि ‘कोड ऑफ कंडक्ट’ के नाम पर हमारे संवैधानिक अधिकारों को दबाया जा रहा है, इसलिए हमारी लड़ाई भले ही छात्रावास और लाइब्रेरी की ही दिखती हो लेकिन इस विरोध प्रदर्शन के जरिए हम उस असंवैधानिक कोड ऑफ कंडक्ट को तोड़ना चाहते हैं जो इस संस्थान में जबरदस्ती लागू किया गया है।

ध्यान देने की बात ये है कि भारतीय जनसंचार संस्थान सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के अंतर्गत आने वाला एक स्वायत्त संस्थान है, अर्थात ये एक सरकारी संस्थान है।

सरकारी संस्थान यानी लोगों के टैक्स के पैसे से चलने वाले संस्थान में ऐसी मनमानी के क्या मायने हैं ?

इसके पहले भी इस संस्थान के वर्तमान डायरेक्टर जनरल के जी सुरेश पर मनमानी के आरोप लगते रहे हैं। साथ ही उन पर यह भी आरोप लगते रहे हैं कि वो भाजपा और RSS समर्थित होने की अकड़ में छात्रों पर रौब दिखाते रहते हैं। इसके साथ ही इस कैंपस में ऐसी गतिविधियों को बढ़ावा देते रहते हैं जो भगवाकरण की नीति को बढ़ावा देती हैं।

पिछले साल मई महीने में भी यज्ञ का आयोजन और विवादित आईजी कल्लूरी के आगमन के विरोध में तत्कालीन छात्रों ने इनका विरोध किया था।

उसके पहले जनवरी 2017 में एक छात्र रोहिन कुमार को महज इसलिए सस्पेंड कर दिया गया था कि उसने प्रशासन की अनियमितताओं पर सवाल उठाता हुआ एक लेख लिखा था, जिसमें आशंका जताई गई थी कि संस्थान का भगवाकरण हो रहा है।

तभी से यह बहस तेज हो गई कि पत्रकारिता के संस्थान में अगर आलोचना की संभावना खत्म कर दी जाएगी तो फिर पत्रकारी मूल्यों का क्या होगा?

अगर यहीं से सिखा दिया जाएगा कि सवाल उठाना गलत है तो फिर यह पत्रकार आगे चलकर बड़े नेताओं,  कॉरपोरेट और अन्य प्रभावशाली लोगों से सवाल कैसे कर पाएंगे ?

छात्रों का आरोप है कि IIMC प्रशासन की मनमानी पर जो भी सवाल उठाता जाता है, उसको किनारे लगा दिया जाता है।

चाहे वो संस्थान के अंदर अध्यापक हो या फिर एडमिनिस्ट्रेशन के अंदर के लोग।

देश के जिम्मेदार मीडिया ट्रेनिंग संस्थान में इस तरह की कुटिल राजनीति और बंदिशों में तैयार हुए ये पत्रकार सच के लिए आवाज उठाने की कितनी हिम्मत कर पाएंगे, ये सबसे बड़ा सवाल है।

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