सबसे कम उम्र की नोबेल पुरस्कार विजेता और लड़कियों की शिक्षा के लिए लगातार संघर्षरत मलाला यूसुफजई का आज बीसवां जन्मदिवस है। याद नहीं आता कि वर्तमान से लेकर इतिहास तक कोई भी ऐसी शख़्सियत रही हो, जो इतनी कम उम्र में ही दुनिया भर में इतना लोकप्रिय हुई हो।

उनकी लोकप्रियता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि मोदी, ट्रंप और ओबामा जैसे तमाम नेताओं को पछाड़ते हुए, मलाला यूसुफजई ट्विटर की सबसे तेज शुरुआत वाली सेलिब्रेटी बनी।

अपने स्कूल के आखरी दिन ट्विटर पर शुरुआत करने वाली मलाला को पहले दिन ही लगभग 4 लाख लोगों ने फॉलो किया। ख़ैर ये तो उनकी लोकप्रियता से जुड़ी बातें हैं। उनके संघर्ष की कहानी और भी दिलचस्प है ।

लड़कियों की शिक्षा के अधिकार की आवाज बुलंद करने वाली मलाला ने  जो संघर्ष किया है, उसके लिए दुनिया उन्हें सलाम करती है।

मलाला का बचपन पाकिस्तान की उस स्वात घाटी में बीता जहां पर आतंक का बोलबाला था, विशेषकर 2009 के बाद आतंक का गढ़ बनता गया। अपनी कट्टरता के लिए मशहूर तमाम रूढ़िवादियों ने भी छोटी सी मलाला पर कम कहर नहीं बरपाया।

बचपन से ही लड़कियों की शिक्षा की तरफदारी करने वाली मलाला पहले तो रूढ़िवादियों की नजरों में चढ़ीं,और उसके बाद आतंकवादियों के।

आतंकी उन्हें अपना दुश्मन मानते भी क्यों ना , उनके आदेश की अवमानना करते हुए , बंद  की घोषणा को दरकिनार करते हुए , लड़कियों को लेकर स्कूल चली जाती थी । स्कूल जाने की उनकी जिद और पढ़कर आगे बढ़ने के उनके हौसले ने आतंकियों की नींद हराम कर दी थी। इससे घबराए हुए आतंकियों ने महज 14 वर्ष की मासूम की हत्या की साजिश रच डाली।

मलाल पर जानलेवा आतंकी हमला

बात है अक्टूबर 2012 की, जब मलाला अपनी सहेलियों संग स्कूल से वापस आ रही थी। स्कूल बस रुकवाकर आतंकियों ने पूछा कि मलाला कौन है ।डरे-सहमे बच्चों के हाव-भाव और इशारों से समझ कर मलाला को पहचानते हुए आतंकियों ने गोली चला दिया । मलाला के सिर में गोली लगी जिससे आतंकियों को लगा कि वो मर गई। लेकिन दुनिया भर में करोड़ों लोगों की दुआओं का ही असर था कि न मलाला की जान निकली और न ही उसके हौसले कम हुए ।

महीनों तक लगातार इलाज चलता रहा और दुनिया भर में मलाला के समर्थन में लोग सड़कों पर आने लगे । उनके समर्थन का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि संयुक्त राष्ट्र संघ में लगभग 200 देशों ने मलाला पर हुए हमले की कड़ी निंदा करते हुए शपथ लिया कि बच्चियों की शिक्षा के लिए विशेष प्रबंध किया जाएगा।

मलाला पर यह पहला बड़ा हमला था लेकिन यह उनका पहला बड़ा प्रयास नहीं था । इसके पहले भी 11 साल की उम्र से ही उन्होंने बीबीसी के लिए डायरी लिखना शुरु कर दिया था और अपना छद्म नाम रखा था ‘गुल मकई’ । बीबीसी  उर्दू के लिए लिखी जाने वाली अपनी डायरी के जरिए स्वात घाटी में तालिबान की आतंकी दास्तान बताने वाली मलाला उन दहशतगर्दों को चुनौती पेश कर रही थी जिनका फरमान था कि लड़कियां न तो स्कूल जाएंगी न ही किसी भी तरह की मनोरंजक गतिविधियों में भाग लेंगी । इसी क्रम में चुन-चुनकर लड़कियों के स्कूल को बारूद  से उड़ाया गया ।सभी ने अपना स्कूल खोया, मलाला ने भी ।

अब मलाल के पास दो ही राहें थी, या तो चुपचाप बर्दाश्त करती  या फिर आवाज़ उठाती । उन्होंने आवाज उठाई-उस आतंक के खिलाफ ,उसी ज्यादती के खिलाफ और कट्टर सोंच के खिलाफ ।

तालिबानियों ने ना तो  स्कूल बंद करना रोका और ना ही हमले करना । लेकिन मलाला ने भी अपना हौसला नहीं खोया । वह लगातार आतंक के खिलाफ लिखती रही और एक समय के बाद उन्होने अपना छद्म नाम हटाकर घोषित किया की गुल मकई कोई और नहीं है मलाला यूसुफजई है।

बस फिर क्या था , वो आ गई आतंकियों के राडार पर और रची जाने लगी उनकी हत्या की साजिश । उनपर आतंकी हमले की साजिश रचने वाला तहरीक-ए-तालिबान (पाकिस्तान) को इस बात का अंदाजा भी नहीं होगा कि उनकी इस करतूत से दुनिया की नजरों में मलाला का कद कितना बढ़ गया।

लड़कियों की शिक्षा के अधिकार के लिए लगातार प्रयास कर रही मलाला को राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर तमाम पुरस्कार मिले। जिसमें 2011 में पाकिस्तान का राष्ट्रीय युवा शांति पुरस्कार, 2013 में अंतर्राष्ट्रीय बाल शांति पुरस्कार , 2013 में ही संयुक्त राष्ट्र का मानवाधिकार सम्मान और उसके बाद नोबेल पुरस्कार।

संयुक्त राष्ट्रसंघ ने 12 जुलाई को मलाला दिवस के रूप में मनाने की घोषणा की  जबकि 2013 में इसी दिन मलाला यूसुफजई ने संयुक्त राष्ट्र संघ में संबोधित करते हुए एक बेहतरीन भाषण दिया था। जिसने पूरी दुनिया को झकझोर दिया और बाल शिक्षा अधिकारों के लिए सभी का ध्यान खींचा।

19 वर्ष की उम्र में अगर मलाला ने ये मुकाम हासिल किया है और लाखों-करोड़ों को प्रेरित किया है तो ऐसे इंसान को 100 साल की उम्र मिले, इसकी दुआ कौन नहीं करेगा।

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