सूचना क्रांति के बाद का यह दौर सूचनाओं के विस्फोट का है। सूचनाओं की भरमार है और वह चारों ओर फैली हुई हैं। लेकिन इन सूचनाओं को खबर बनाने से पहले इनकी जांच पड़ताल जरूरी होती है। बिना जांचे परखे और पुष्ट किए सूचनाओं को खबरों में बदलकर पाठकों तक नहीं पहुंचाया जाता।

यह मूल सिद्धांत पत्रकारिता की पढ़ाई करने वाले हर छात्र को बताई जाती है। इसके बावजूद आज के बड़े-बड़े संस्थान खबरों की आपाधापी में पत्रकारिता के इस बुनियादी सिद्धांत को मानो भुला बैठे हैं। खबरों की आपाधापी और सबसे पहले खबर ब्रेक करने की दौड़ में आज सभी मीडिया हाउस लगे हैं। इस दौड़ में एजेंसियों की सुविधा ने और तेजी ला दी है। एजेंसी से फीड आया नहीं कि बिना पुष्टी किए खबरें ब्रेक की जाती हैं। और इसी जल्दबाजी में अक्सर गलत या आधी-अधूरी एकपक्षीय खबरें चल जाती हैं। जो पाठकों के साथ एक प्रकार से धोखा करना है।

ताजा मामला भारतीय क्रिकेट टीम के कोच की नियुक्ति से जुड़ा है। मंगलवार की शाम को समाचार एजेंसी एएनआई ने ट्विट कर जानकारी दी कि बीसीसीआई ने रवि शास्त्री को 2019 तक टीम का कोच नियुक्त कर दिया है। इसके फौरन बाद सभी समाचार चैनलों और उनकी वेबसाइट पर यह खबर चलने लगी। चैनलों ने फटाफट अपने ट्विटर हैंडल पर इस खबर को शेयर कर दिया। कई चैनलों के स्पोर्ट्स एडीटरों ने तो इसपर विशेष चर्चा भी शुरू कर दी।

लेकिन, कुछ ही देर में बीसीसीआई सचिव अमिताभ चौधरी ने प्रेस वार्ता कर इस खबर का खंडन करते हुए कहा कि भारतीय क्रिकेट टीम के कोच के सन्दर्भ में अभी कोई अंतिम फैसला नहीं लिया गया है। उन्होंने कहा कि उन्हें उम्मीद है कि इस संबंध में आज ही कोई फैसला ले लिया जाएगा।

अब सवाल उठता है कि क्रिकेट कोच की नियुक्ति के संबंध में इतनी अफरातफरी की क्या जरूरत थी। चैनलों के किसी रिपोर्टर या एडीटर ने बीसीसीआई के अधिकारियों से पुष्टी क्यों नहीं की। अगर बीसीसीआई ने एएनआई को जानकारी दे दी थी तो फिर सभी चैनलों को देते।

क्या क्रिकेट टीम के कोच की नियुक्ति इतनी बड़ी और अहम खबर है जिसकी पुष्टी का इंतजार भी नहीं किया जा सकता। हो सकता है सूत्रों के हवाले से आई यह खबर सही हो और रवि शास्त्री कोच बना दिए जाएं। मगर बिना पुष्टी किए खबर चला देना और थोड़ी देर बाद गलत होने पर उसे हटा लेना कहां तक सही है।

दरअसल समाचार एजेंसियों की सुविधाओं के चलते ज्यादातर मीडिया हाउस अक्सर ऐसी गलतियां कर बैठते हैं। अगर दूसरे शब्दों में कहें तो भारत में लगभग सभी मीडिया हाउस खबरों के लिए पूरी तरह से एजेंसियों पर निर्भर हो गए हैं। खासकर एएनआई नामक एजेंसी पर। एजेंसियों पर निर्भर होना गलत नहीं है। लेकिन क्या पूरी तरह से निर्भर हो जाना सही है।

अगर किसी घटना की खबर एजेंसी न दे पाए या जानबूझकर रोक दे तो क्या यह पाठकों-दर्शकों के साथ अन्याय नहीं है। हर बड़े मीडिया हाउस में खेल का संपादक, एंकर होता है। तो क्या ये सब लोग सिर्फ टीम के साथ विदेश दौरों पर जाने के लिए होते हैं। दिल्ली और मुंबई में रहकर भी जब ये खुद खबर नहीं दे सकते तो फिर इनकी जरूरत ही क्या है। ऐसी स्थिति में खबरों और खबरों की दुनिया पर एएनआई जैसी एजेंसियों का कब्जा होने से कौन रोक सकेगा।

मीडिया संस्थानों को यह बात याद रखना होगा कि अगर गलती से भी पाठकों और दर्शकों तक गलत जानकारी पहुंचती है तो उनके साथ धोखा तो होता ही है मीडिया हाउस की भी साख पर बट्टा लगता है। देश की मीडिया को पत्रकारिता के पुराने सिद्धांतों की तरफ लौटना होगा अन्यथा वह दिन दूर नहीं जब इनकी खबरों पर लोग विश्वास करना छोड़ देंगे।

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