दिल्ली पुलिस हाय-हाय, दिल्ली पुलिस होश में आओ, दिल्ली पुलिस शर्म करो, पत्रकारों पर हमला बंद करो, पत्रकारों पर हमला नहीं सहेंगे… आज ये नारे लगाया जा रहे थे दिल्ली पुलिस मुख्यालय के बाहर।

पत्रकारों का एक बड़ा समूह आज तपती धूप में अपने खिलाफ हुए हिंसा का विरोध कर रह है। इस प्रदर्शन में कई वरिष्ठ पत्रकार शामिल हुए।

इनकी मांग थी कि उन पुलिसवालों को सस्पेंड किया जाए जिन्होंने पत्रकारों के साथ छेड़छाड़ और हिंसा की है। दिल्ली पुलिस कमिश्नर खुद अपने वातानुकूलित कमरे से बाहर निकलकर हमसे माफी मांगे और विश्वास दिलाए की दोबारा ऐसी घटना नहीं होगी।

दरअसल 23 मार्च को दिल्ली पुलिस ने जेएनयू छात्रों के ‘शांतिपूर्ण प्रदर्शन’ पर लाठीचार्ज कर दिया। लाठीचार्ट के दौरान पुलिस छात्रों और पत्रकारों को बूरी तरह पीटा। एक पत्रकार का हाथ टूट चुका है, कई पत्रकारों को गंभीर चोट आयी है। एक महिला फोटो जर्नलिस्ट से पुलिस की मारपीट का वीडियो सोशल मीडिया पर खूब वायरल हो रही है। फोटो जर्नलिस्ट का आरोप है कि पुलिस ने उसके साथ छेड़छाड़ की और कैमरे छीन लिए।

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जेएनयू के छात्र और प्रोफेसर यूनिवर्सिटी में 75 फीसदी उपस्थिति अनिवार्यता के विरोध, छेड़छाड़ के आरोपी प्रोफेसर अतुल जौहरी के खिलाफ कार्रवाई समेत अन्य मांगों को लेकर संसद तक मार्च निकाल रहे थे। पत्रकार इस प्रदर्शन की रिपोर्टिंग कर रहे थे। तभी आईएनए के पास ने रोका और जमकर लाठी चार्ज किया। इस दौरान कई पत्रकारों के कैमरे भी तोड़ दिए गए।

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ऐसे में सवाल उठता है कि दिल्ली पुलिस बार बार पत्रकारों के कैमरे पर हमला क्यों करती है? क्या दिल्ली पुलिस कैमरे कैद अपनी हिंसा के सबूत को मिटा देना चाहती है?

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