भारत के राजनीतिक इतिहास में बहुत नेता आये और चले गए लेकिन कांशीराम जैसे बहुत कम आये। जीवन संघर्ष का दूसरा नाम है और जिन आदर्शो को लेकर वो चले उन्ही को अंत तक निभाये,ये बहुत कम लोगो में देखने को मिलता है। कांशीराम ने राजनीति की परिभाषा ही बदल दी..आज की राजनीति पाखंड के पहिये लगा कर चलती है आप जीवन मे बोलते कुछ है और करते कुछ..लेकिन कांशीराम ने जो बोला वही किया भी।
वो कहते थे कि हम पहला चुनाव हारने के लिए लड़ेंगे दूसरा चुनाव हरवाने के लिए और तीसरा हम खुद जीतने के लिए लड़ेंगे..हूबहू ऐसे ही हुआ।

ताक़त खाली जीतने में ही नही होती ,ताक़त अपने को सरवाइव करने में भी होती है।

आगरा में रह रहे अपने भाई से एक बार मैंने पूछा कि कांशीराम जी की यूपी में ताक़त का आधार क्या है? उनका जवाब था ..कि उनका अपने वोटरों के प्रति कमिटमेंट…जैसे उनके वोटर थे.. जैसे उनके समर्थक थे ,ठीक वैसे वो उनके जैसे बन जाते थे।

कांशीराम ने सैकड़ों किलोमीटर साइकल पर यात्रा की,मलिन बस्तियो में सोए और चमार जाति के लोगों के घरों में रहे ,उनके साथ समन्यवय स्थापित किया जो आगे चल कर उनका मूल आधार वोट बना,उनका काडर बना।

कांशीराम के साथ मीडिया ने न्याय नही किया ,बदले में कांशीराम ने भी उनकी परवाह नही की,मीडिया की ज़रूरत कांशीराम थे, कांशीराम की ज़रूरत मीडिया नही थी..

कभी कांग्रेस और भाजपा को टीम ए और टीम बी कहा तो कभी उनको सांपनाथ और नागनाथ कहा, फिर भी इन दोनों राष्ट्रीय दलों ने इनके साथ मिलकर सरकारे बनाई।बाद में उनको तोड़ा भी गया,लेकिन कांशीराम जी की जड़े नही हिला सके।

किसी पद की लालसा नही थी, मुख्यमंत्री नही बने; अटल जी की सरकार ने उन्हें राष्ट्रपति पद का ऑफर दिया जिसे कांशीराम जी ने ठुकरा दिया, सिर्फ इसी विश्वास से कि जिस बहुजन समाज को एकजुट कर एक आधार बनाया है वो अपना रास्ता और मंजिल मेरे बगैर भी पा लेगा,पद तो आने जाने की चीज़ है।

उनपर जाति वादी राजनीति के आरोप लगते है,तो क्या बाकी दल बिना जात पात किये राजनीति कर रहे है? आज उनकी पार्टी कमजोर हालत में है लेकिन उनका काडर अभी मरा नही जिंदा है और कुशल नेतृत्व की बाट जोहता है।

आज के ही दिन वो इस दुनिया को अलविदा कह गए लेकिन भारतीय राजनीति में वो अपना नाम अमर कर गए।

मान्यवर कांशीराम जी को भावभीनी श्रंद्धाजलि..

 –राज ढल

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