योगी आदित्यनाथ के उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के तौर पर पद संभालने के बाद अब उनको एक बड़ी चुनौती का सामना करना पड़ सकता है।यह चुनौती बसपा सुप्रीमो मायावती के रूप में होगी। खबरें है कि मायावती फूलपुर लोकसभा सीट से चुनाव लड़ सकती हैं। इस लड़ाई में मायावती को सपा और कांग्रेस का भी साथ मिल सकता है। लेकिन फूलपुर सीट से सांसद केशव प्रसाद मौर्य के लिए ये शुभ संकेत नहीं माना जा रहा। महागठबंधन हुआ तो मौर्य के लिए सबसे बड़ा सिरदर्द फूलपुर की सीट को दोबारा BJP की झोली में डालना होगा। अगर मायावती विरोधी दलों की साझा उम्मीदवार हुई तो ये कतई आसान नहीं होगा। उत्तर प्रदेश की इस लोकसभा सीट पर अब बड़ा दंगल होगा। जिसमें एक तरफ होंगे योगी और दूसरी तरफ उनके खिलाफ होंगी मायावती। इस लड़ाई को 2019 के चुनावों का ट्रायल भी कहा जा सकता है।

‘फूलपुर’ छोड़ ‘केशव’ को विधानसभा जाना होगा

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के तौर पर योगी आदित्यनाथ के साथ फूलपुर से सांसद केशव प्रसाद मौर्या ने भी उपमुख्यमंत्री के तौर पर शपथ ली थी। संवैधानिक रूप से इन नेताओं को पद पर बने रहने के लिए 19 सितंबर से पहले विधानसभा पहुंचना आवश्यक है। इन दोनों को अपने सांसदीय सदस्य पद से त्यागपत्र देना होगा। योगी गोरखपुर और केशव प्रसाद मौर्या फूलपुर सीट से लोकसभा सदस्य हैं।

‘फूलपुर’ हारे तो ‘मौर्या ‘ का कद BJP में छोटा हो जाएगा

मौर्या अब उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री हैं। उनको अब लोकसभा सीट छोड़ विधानसभा जाना होगा। साथ में उनका काम फूलपुर की सीट से अपने उत्तराधिकारी को लोकसभा में एंट्री दिलवाना होगा।साथ ही केशव मौर्या जानते है कि फूलपुर की राह आसान नहीं है। हालांकि केशव मौर्या को अभी भी मोदी लहर पर पूरा भरोसा है। वो मायावती के इस्तीफ़ा देने के बाद कह चुके है कि ,’जनता जानती है कि बसपा-सपा-कांग्रेस मिली हुईं हैं, उत्तर प्रदेश में बसपा का सफाया हो चुका है। उन्होंने आगे कहा कि मायावती 2019 में अकेले चुनाव नहीं लड़ेंगी, मायावती ने इस्तीफा देने में जल्दबाजी कर दी. चाहें तो वह फूलपुर से चुनाव लड़कर देख लें।बीजेपी ने 2014 में पहली बार फूलपुर सीट पर जीत का स्वाद चखा था। तब केशव ने बड़े अंतर से जीत हासिल कर राजनीतिक गलियारे में हलचल मचा दी थी। इस चुनाव के बाद केशव का कद लगातार बढ़ता ही गया।

‘फूलपुर’ किसी ज़माने में ‘कांग्रेस’ का गढ़ था

कांग्रेस और सपा दोनों इस बात के लिए राजी हैं कि देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू का संसदीय क्षेत्र रहे फूलपुर में तीनों दल मिलकर अपना प्रत्याशी उतारें। देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने 1952 में पहली लोकसभा में पहुंचने के लिए इसी सीट को चुना और लगातार तीन बार 1952, 1957 और 1962 में उन्होंने यहां से जीत दर्ज कराई थी। नेहरू के निधन के बाद उनकी बहन विजय लक्ष्मी पंडित ने 1967 के चुनाव में जनेश्वर मिश्र को हराकर नेहरू और कांग्रेस की विरासत को आगे बढ़ाया। 1971 में यहां से पूर्व प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह कांग्रेस के टिकट पर जीत कर लोकसभा पहुंचे। 1977 में जनता पार्टी ने ये सीट कांग्रेस से पहली बार छीनी। 1984 में हुए चुनाव में ये सीट एक बार फिर कांग्रेस के हाथ आ गई। 1989 और 1991 के चुनाव में जनता दल ने जीत हासिल की। 1996 से 2004 के तक लगातार 4 बार समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार जीतते रहे। 2004 में बाहुबली नेता अतीक अहमद ने फूलपुर से जीत दर्ज की।

लालू यादव नए समीकरण जोड़ रहे है 

राष्ट्रीय जनता दल के सुप्रीमो लालू यादव UP में भी महागठबंधन की नींव रखने के लिए अहम भूमिका निभा रहे हैं। मायावती को बिहार से राज्यसभा में भेजने का विकल्प और फिर माया को फूलपुर से विपक्ष की साझा उम्मीदवार बनाने की वो वकालत कर चुके है। UP के महागठबंधन में कृष्णा पटेल के गुट वाले अपना दल को भी साथ लेने की कोशिश हो रही है। केशव प्रसाद मौर्या 6 महीने के अंदर उत्तर प्रदेश में किसी भी सदन (विधानसभा या विधानपरिषद) का सदस्य होना होगा और अपनी लोकसभा सीट से इस्‍तीफा देना होगा।

‘मायावती’ भी अब आक्रामक राजनीति करने के मूड में

मायावती ने संकेत दिया कि बसपा के बेस वोट को बनाए रखने के लिए वो अब आक्रामक राजनीति करेंगी। 18 सितंबर को वो अपना अभियान शुरु करेंगी। इसकी शुरुआत मेरठ में एक रैली से होगी। मायावती अब हर महीने की 18 तारीख को मंडल स्तर पर कार्यकर्ताओं के साथ मीटिंग करेंगी।

एक -एक दलित तक मायावती का संदेश पहुंचाने की तैयारी

इसके अलावा मायावती ने 28 जुलाई को पार्टी की मीटिंग बुलाई है। जिसमे मायावती सभी कार्यकर्ताओं और नेताओं को साफ़ हिदायत दे सकती है कि UP के हर गांव में हरेक दलित घर में ये बात पहुंचे की मायावती ही दलितों की सबसे बड़ी लीडर है। इसके लिए नेताओं की स्पेशल ड्यूटी लगाई जाएगी। मायावती के इस्तीफे के बारे में बसपा कैडर ये सन्देश पहुंचाएगा कि मायावती ने इसलिए इस्तीफ़ा दिया है क्योंकि उसको दलितों की आवाज़ नहीं उठाने दिया जा रहा। इसके लिए पोस्टर और वीडियो संदेशों का भी इस्तेमाल किया जा सकता है।

भाजपा की राह आसान नहीं

भाजपा ने 2014 में फूलपुर सीट से जीत हासिल की थी और उस वक्त केशव प्रसाद मौर्या को करीब 5 लाख से ज्यादा वोट मिले थे। जबकि बसपा उम्मीदवार कपिल मुनि को 1 लाख 63 हजार 710 वोट मिले। समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार धर्मराज पटेल को 1 लाख 95 हजार 256 और कांग्रेस उम्मीदवार मोहम्मद कैफ को 58, 127 वोट मिले थे। इस सीट पर अगर मायावती मैदान में उतर जाए और बीजेपी विरोधी दल एकजुट हो जाए तो भाजपा के लिए इस सीट से जीत हासिल करना आसान नहीं होगा।

‘केशव’ को कहीं कुर्बानी न देनी पड़ जाए

मायावती अगर फूलपुर सीट से जीत जाती है तो मौर्य के साथ -साथ ये उत्तर-प्रदेश BJP , मुख्यमंत्री योगी के लिए बड़ा झटका होगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मिशन 2019 पर भी फिर सवाल खड़े हो सकते है। इसलिए बीजेपी के पास सिर्फ एक ही विकलप होगा कि केशव प्रसाद मौर्य को उपमुख्यमंत्री पद से इस्तीफ़ा देकर सांसद ही बने रहे । BJP उन्हें को और बड़ी जिम्मेदारी भी सौप सकती है। लेकिन उन्हें अपनी पद की शायद कुर्बानी देनी पड़ सकती है।

BJP अपने ही चक्रव्यू में फंस गई है

UP में होने वाले उपचुनाव में गोरखपुर लोकसभा सीट पर समाजवादी पार्टी अपना उम्मीदवार उतारना चाहती है औरविधानसभा की सिकंदरा सीट से कांग्रेस अपना कैंडिडेट उतार BJP को टक्कर देना चाहती है। अगर विपक्षी दलों की ये यह सियासी चाल सटीक बैठती है तो भाजपा का मिशन फ़तह 2019 कतई आसान नहीं होने वाला ।

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