मुकाबला रोमाचंक रहा। खैर बीजेपी दोनों राज्यों (गुजरात और हिमाचल) में जीत चुकी है और जल्द ही सरकार बनाने वाली है। हार- जीत दोनों का विश्लेषण होना चाहिए। चुनाव दो राज्यों में थे लेकिन पूरे देश की नजर गुजरात चुनाव पर थी।

कारण कुछ इस प्रकार है- गुजरात नरेंद्र मोदी की जन्मभूमि और कर्मभूमि दोनो है, मोदी ने गुजरात से चार बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ली है, 1995 से लेकर 2017 तक गुजरात में बीजेपी का शासन था, यहां सबसे चर्चित दंगा ‘गोधरा-गुजरात’ हुआ था, 2014 लोकसभा में गुजरात मॉडल के नाम पर वोट मांगा गया था, राहुल गांधी धारदार भाषण दे रहे थें, अल्पेश, जिग्नेश, हार्दिक की खास चर्चा थी, इस चुनाव के परिणाम 2019 लोकसभा चुनाव पर भी असल डालेंगे….इत्यादी

हुआ क्या ?

गुजरात में बीजेपी 182 में से 99 सीट जीत गई, बहुमत के लिए 92 की जरूरत होती है। कांग्रेंस ने 77 सीटों पर जीत दर्ज की, इस आंकड़े तक कांग्रेस पिछले दो दशक में नहीं पहुंची थी। निर्दलीय कांग्रेस के सपोर्ट से लड़ रहे दलित नेता जिग्नेश मेवाणी अपनी सीट (वडगाम) जीत गए। छोटुभाई वसावा की भारतीय ट्राइबल पार्टी ने दो सीट जीती। शरद पवार की पार्टी एनसीपी को भी 1 सीट हासिल हुई। बाकि बची दो सीटो पर निर्दलीय उम्मीदवार जीत गए।

ध्यान देने वाली बात

गुजरात में बीजेपी की जीत और कांग्रेस के हार में ज्यादा फर्क नहीं है। बीजेपी की जीत हार के बराबर और कांग्रेस की हार को जीत के बराबर कहा जाए तो ज्यादा फर्क नहीं पड़ेगा। लगातार 22 साल शासन करने के बाद भी किसी राज्य में सरकार बना लेना आम बात तो नहीं ही है हालांकि कांग्रेस ने भी इसी गुजरात में 23 साल तक (1962 से 1985 ) सरकार में बने रहने का गौरव हासिल किया था. इसके अतिरिक्त पश्चिम बंगाल में लेफ्ट ने भी ऐसा किया है।

लेकिन इसका दूसरा पक्ष ये है कि अगर जनता ने आपको 22 साल तक नेतृत्व करने का मौका दिया तो आपने उनके लिए क्या किया? 22 साल जितना लंबा वक्त मिलने के बाद इतना कुछ कर देना चाहिए कि वोट मांगने की जरूरत ही न पड़े, क्या बीजेपी ऐसा कुछ कर पायी? नहीं कर पायी। इस चुनाव में प्रचार के दौरान वोट के लिए खुद पीएम ने सारी हदें पार कर दी।

विकास की पटरी से उतर पाकिस्तान में घुसा चुनाव प्रचार

“मैं हूं विकास, मैं हूं गुजरात” के नारे साथ शुरू हुआ चुनाव कब भाषा और भाषण के निचले स्तर पर पहुंच गया पता ही नहीं चला। विकास के नाम पर शुरू हुए चुनाव प्रचार अंत आते-आते हिंदुत्व का रुप ले लिया। कांग्रेस ने विधानसभा चुनावों की तारीखें तय होने से पहले ही “विकास पगला गया है” अभियान के तहत भाजपा के ख़िलाफ़ माहौल बना दिया था।

इसके जवाब में पीएम ने “मैं हूं विकास, मैं हूं गुजरात” और ‘अडीखम गुजरात’ जैसे नारे दिए। पहले चरण का चुनाव खत्म हुआ और बीजेपी को ये अहसास हो गया कि उनके विकास का नारा फ्लॉप हो रहा है। फिर पीएम मोदी ने अपने विकास की गाड़ी को धुमाया और चल दिए हिंदुत्व के रास्ते।

पीएम जनसभा के मंच से 8-9 फिसदी अल्पसंख्यकों का डर गुजरात के बहुसंख्यक को दिखाते नजर आए। प्रधानमंत्री अपने भाषणों में कभी औरंगज़ेब का जिक्र करते, तो कभी अलाउद्दीन ख़िलजी, हाफिज सईद, बाबर, राम, मंदिर, मस्जिद और तीन तलाक़ का। लेकिन हद तो तब हो गई जब उन्होंने पाकिस्तान का जिक्र किया।

पीएम ने कहा था “कल मणिशंकर अय्यर के घर हुई एक मीटिंग की मीडिया रिपोर्ट्स आई हैं, जिसमें पाकिस्तान के हाई कमिशनर, पूर्व विदेश मंत्री और पूर्व पीएम मनमोहन सिंह शरीक हुए थे, यह मीटिंग करीब 3 घंटे चली।”

बाद में पीएम के इस बयान की कड़ी आलोचना की गई लेकिन उन्होंने कोई सफाई नहीं दी। जबकि ये मीटिंग सिक्रेट नहीं थी, पूर्व निर्धारित थी। एक भारतीय थिंकटैंक के समारोह में शामिल होने के लिए सब इकठ्ठा हुए थें। पीएम याचक की मुद्रा में भी नजर आए, उन्होंने कहा ‘अगर आप मेरा साथ नहीं देंगे तो मैं कहां जाऊंगा’

इतना ही नहीं चुनाव प्रचार के दौरान बीजेपी समर्थित समुहों के द्वारा एक पोस्टर भी जारी किया गया जिसमें HAJ (हार्दिक, अल्पेश, जिग्नेश) लिखा हुआ था, वही दूसरी तरफ RAM (रुपाणी, अमित, मोदी) लिखा हुआ था। मतलब साफ-साफ बटवारे और नफरत का सहारा लेकर चुनाव लड़ा गया।

ये मैसेज दिया गया कि अगर आप कांग्रेस को वोट देते हैं तो गुजरात में मुस्लिम राज हो जाएगा और बीजेपी को वोट देते हैं तो रामराज आ जाएगा। इसके अलावा एक वीडियो भी जारी किया था जिसका जिम्मा किसी ने नहीं लिया लेकिन वो वीडियो बीजेपी के समर्थन में बनाया गया था। वीडियो में आजान (प्रार्थना) सुनाई देती है और लड़की डरते हुए घर की तरफ बढ़ रही होती है। इनसब के बावजूद गुजरात की जनता ने बीजेपी को मात्र 99 सीटों पर समेट कर ये संदेश दिया है कि नफरत की राजनीति नहीं चलेगी और ये भी की नरेंद्र मोदी अजय नहीं है उन्हें हराया जा सकता है।

हालांकि राहुल गांधी ने भी सॉफ्ट हिंदूत्व की राजनीति की लेकिन ज्यादा फोकस बीजेपी के कथित गुजरात मॉडल पर रहा। राहुल गांधी ने ओबीसी, अल्पसंख्यकों, दलितों, किसानों और बेरोज़गारी पर सवाल उठाए। खाम रणनीति यानी क्षत्रिय, हरिजन, आदिवासी और मुस्लिम मतों को अपने साथ एकजुट करने की कोशिश की लेकिन चुनाव को भगवा बनाम हरा बनाने की कोशिश नहीं की।

मीडिया का रोल

गुजरात चुनाव को लेकर ज्यादातर मीडिया कवरेज पर बस इतना ही लिखा जा सकता है कि ‘ये बिक गई है मीडिया’

कांग्रेस को क्या मिला?

चुनाव में हार के बावजूद कांग्रेस को बहुत कुछ मिला है। राहुल गांधी के रुप में एक राष्ट्रीय नेता मिला है जो अपनी बातों से जनता को मोह लेने में सफल हो रहा है। 2019 के लोकसभा चुनाव में इसका बड़ा फायदा मिल सकता हैं कांग्रेस को। इतना ही नहीं गुजरात में कांग्रेस एक मजबूत विपक्ष के रूप में उभरी है। पिछले दो दशक में पहली बार कांग्रेस को गुजरात में 77 सीट मिली है। अल्पेश और जिग्नेश जैसे युवा नेता गुजरात के विधानसभा में पहुंचे हैं।

आकड़ों के झरोखे से बीजेपी ने क्या खोया?

पहले तो ध्यान से बीजेपी की जीत को देखना चाहिए। कहां कितना वोट मिला इसका आंकलन करना चाहिए। पता चलेगा की बीजेपी कहां जीती है और कहां हारी है। जैसा की बीजेपी पर पहले सी ही ठप्पा लगा हुआ है कि ये शहरी पार्टी (खाए-अघाए लोगों की पार्टी) है, इस चुनाव में इसका प्रमाण भी मिला।

वरिष्ठ पत्रकार शीला भट्ट ने बताया कि कैसे बीजेपी ज्यादातर शहरी इलाकों में जीतीं है और ग्रामिण में बूरी तरह हारी है। शीला भट्ट ने लिख है कि…
अहमदाबाद में भाजपा ने 21 में 16 सीटें जीतीं
सूरत की 16 सीटों में 15
वडोदरा की 10 में से 9
राजकोट में 8 में से 6 सीटें।
यानी प्रदेश के चार बड़े शहरों की 55 सीटों में 46 भाजपा को मिली हैं।

अब घड़ी भर को इन चार शहरों को अलग रख कर देखें। तो बाक़ी 127 सीटों में किसको क्या मिला –

भाजपा – 53
कांग्रेस – 71
अन्य को – 3

ज़ाहिर है, भाजपा की जीत महज़ चार शहरों की जीत है, समूचे गुजरात राज्य की तो नहीं।

अब वोट प्रतिशत को छोड़ दें तो इस चुनाव में बीजेपी को नुकशान ही नुकशान हुआ है। आकड़ों के झरोखे से देखे तो…

  • 1995 के गुजरात चुनाव में बीजेपी को 121 सीटें मिली थी
  • 1998 के गुजरात चुनाव में बीजेपी को 117 सीटें मिली
  • 2002(दंगे के बाद) के गुजरात चुनाव में बीजेपी को 127 सीटें मिली
  • 2007 के गुजरात चुनाव में बीजेपी को 117 सीटें मिली
  • 2012 के गुजरात चुनाव में बीजेपी को 115 सीटें मिली
  • 2017 के गुजरात चुनाव में बीजेपी को 99 सीटें मिली

अंकित राज

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