जिस देश में ब्राह्मणवाद का वर्चस्व हो और मनुवादी विचारधारा जन जन में समाई हो वहां महिलाओं के अधिकार की बात करना किसी चुनौती से कम नहीं था , और इस चुनौती को स्वीकारा पेरियार रामस्वामी नायकर ने। द्रविड़ियन आन्दोलन के नायक ने सिर्फ नस्लीय और जातीय भेदभाव के खिलाफ आवाज़ नहीं उठाई बल्कि उनको भी अपने हक की बात करने के लिए प्रेरित किया जो इस देश में सबसे ज्यादा शोषित और दलित रही हैं – वो हैं देश की आधी आबादी यानी महिलाएं।

पेरियार रामस्वामी नायकर ने स्वाभिमान आंदोलन शुरू किया जो उनके बाद में चलाये गए ‘द्रविड़ कषकम’ का एक अंग था। पेरियार ने पुरुष सत्ता को ब्राह्मणवादी तंत्र द्वारा निर्मित षड्यंत्र के रूप में देखा।

यह षड्यंत्र पौराणिक, धार्मिक ग्रन्थों में ब्राह्मणों द्वारा निर्मित है जिनका उपयोग स्त्रियों और ब्राह्मणेतर जातियों को दबाने और हाशिये पर रखने के लिए किया जाता है। पेरियार ने पुरुष वर्चस्ववाद का विरोध किया और स्त्रियों से पुरुष सत्ता द्वार निर्मित इन नियमों को तोड़ने का आहवान किया।

उन्होंने द्रविड संस्कृति में स्त्री शक्ति के उदाहरण के तौर पर इंलगोवडिक के ‘चिलप्पतिकारम्’ का उल्लेख किया है जिसमें उसका नायक कोविलन नर्तकी माधवी के आकर्षण में फंसकर पत्नी कण्णकी की उपेक्षा करता है। कण्णकी के विद्रोह की आग में मधुरा शहर ही जल जाता है।

इस रचना में तत्कालीन शासक की दण्डनीतियों को स्त्री चुनौती देती है। पेरियार ने बाताया कि स्त्रियों के अबला होने की हीनताग्रन्थी का उपयोग पितृसत्ता द्वारा उनका दमन और अपना वर्चस्व स्थापित करने के लिए किया जाता है। उन्होंने आंदोलन अपने तमिल भाइयों को मातृसमूह की रक्षा करने के लिए आगे आने का आह्वान किया। अपने आंदोलन के ज़रिए पश्चिमी प्रतिरूप से भिन्न एक अलग लिंग अस्मिता तमिलनाडू की स्त्रीयों में जागने में उन्हें सफलता मिली।

पेरियार ने जाति व्यवस्था और पितृसत्ता के द्वारा निर्मित मूल्यों का विरोध करते हुए स्त्री-पुरुष की समानता की आवाज़ उठायी। उन्होंने पहचान लिया था कि जाति और लिंग के आधार पर स्थापित असमानताओं को मिटाने की शक्ति स्त्री शिक्षा से ही मिल सकती है।

अपने आंदोलन में पेरियार ने जन शिक्षा द्वारा सामाजिक सुधार लाने का प्रयास किया। सन् 1928 में अपने ‘कुटियरशु’ अखबार में ‘पेण्णिना नल्लर’ नाम से स्त्री शिक्षा, तमिल संस्कृति, विवाह, विधवाओं की स्थिति, ब्राह्मण वाद जैसे विषयों पर साल भर चर्चा परिचर्चा चलते रहे। यही बाद में उनके द्रविड़ आंदोलन का वक्तव्य बना।

उन्होंने खुले तौर पर बताया कि नैतिक मान्यताएं सब एकतरफा हैं, सिर्फ स्त्रियों को सारा दोष दिया जाता है उनका ही अपमान किया जाता है और उनके प्रति ही अन्याय किया जाता है। पेरियार ने विवाह को गुलामी प्रथा के रूप में नहीं, एक दूसरे के स्वाभिमान को, आत्म गौरव को, बनाये रखनेवाले रस्म के रूप में देखा।

स्वाभिमान आंदोलन के कार्यकर्ताओं ने अनाचारों का विरोध ही नहीं किया, अंतर्जातीय विवाह भी कराये जिसके कारण प्रभावित जाति समूहों द्वारा संगठन का विरोध भी किया गया। विवाह को स्वाभिमान के आधार पर व्याख्यायित करने के कारण स्त्रियों को समानता का दर्जा मिला, यदि ऐसा नहीं है तो विवाह से मुक्ति के लिए भी रास्ता साफ़ हुआ।

असंतुष्ट वैवाहिक जीवन में तलाक को पेरियार ने एक विकल्प के रूप में प्रस्तावित किया। उनका विचार था कि अगर तलाक को पेरियार ने एक विकल्प के रूप में प्रस्तावित किया। उनका विचार था कि अगर तलाक का अधिकार नहीं दिया जाएगा तो बहुपत्नीत्व और बहुपतित्व को रोका नहीं जाएगा।

पेरियार ने इन विचारों का तमिलनाडु के समान्य जन समूहों पर बड़ा गहरा प्रभाव पड़ा और स्त्री के स्वाभिमान की समस्या एक राजनीतिक, समाजिक एंव सांस्कृतिक मुद्दा बन गया। पेरियार के द्रविड़वाद को उतना व्यापक समर्थन सभी वर्गों से नहीं मिला, लेकिन उनके स्वाभिमान आंदोलन का बहुत बड़ा प्रभाव स्त्रियों और युवा वर्ग पर पड़ा।

 

 (डॉ के. एम. मालती की किताब स्त्री विमर्श: भारतीय परिप्रेक्ष्य का छोटा सा अंश)

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