भारतीय न्यायपालिका में दलित-आदिवासी-पिछड़ों और अल्पसंख्यकों की बात नहीं सुनी जाती, उन्हें न्याय नहीं मिलता, यह एक ऐसी अप्रिय सच्चाई है जिससे कोई भी इंकार नहीं कर सकता।

दिसंबर 2017 में राष्ट्रीय लोक समता पार्टी के नेता उपेंद्र कुशवाहा ने कहा था कि आजादी के बाद से आज तक करीब 250-300 घराने हैं जिनके लोग ही हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में जज बनते रहे हैं और अब भी उन्हीं के परिवार के लोग जज बन रहे हैं। दलित-पिछड़े वर्ग के लिए दरवाजा बंद है। इस दरवाजे को खोलना होगा।

पिछले साल अंबेडकर के परिनिर्वाण दिवस पर राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने न्यायपालिका में दलितों के कम प्रतिनिधित्व को लेकर चिंता जाहिर की थी। ये एक बहुत ही भयानक समस्या है जो कभी-कभी ही मीडिया में दिखाई देता है। लेकिन, इस समस्या कुप्रभाव हर रोज दलितों और पिछड़ों को झेलना पड़ता है। एक अनुमान के अनुसार जेलों में बंद 90 प्रतिशत से ज्यादा कैदी दलित-बहुजन पृष्ठभूमि के हैं। फांसी पर चढऩे वाले कैदी भी इन्हीं वर्गों के होते हैं। 

न्यायपालिका में दलित जजों के कमी का खामियाजा दलितों को कुछ इस तरह भुगतना पड़ रहा है कि हाईकोर्ट का जज उन्हें मैला (पखाना) साफ न करने पर 25,000 रुपये का जुर्माना लगा दे रहा है।

मद्रास हाईकोर्ट के एक जज ने दलित दंपत्ति पर 25,000 रुपये का जुर्माना लगा दिया क्योंकि उन लोगों ने बतौर मैनूअल स्कैवैन्जर्स काम करने से मना कर दिया।

दंपत्ति का कहना है कि कोर्ट ने हमारी एक भी शिकायत नहीं सुनी। उल्टा हमपर 25,000 रुपये का जुर्माना लगा दिया गया और जान से मारने की धमकी भी मिल रही है। हमारे बच्चे स्कूल नहीं जा रहे क्योंकि हमारे पास रुपये नहीं बचे।

मद्रास हाईकोर्ट का कहना है कि जैसे कि स्वीपर/स्कैवेंजर को काम दिया जाता है, उन्हें टॉयलेट भी साफ करना पड़ेगा क्योंकि उनकी नियुक्ति घरेलू नौकरानी के तौर पर हुई तो उन्हें पूरे परिवार के कपड़े भी धोने होंगे। उसी तरह स्वीपर यह शिकायत नहीं कर सकता कि उन्हें टॉयलेट साफ करने के लिए बाध्य किया जा रहा है।

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