समाजवादी पार्टी के पूर्व प्रमुख मुलायम सिंह यादव का संसदीय क्षेत्र आज़मगढ़ इन दिनों सुर्ख़ियों में है। बाहुबली विधायक मुख़्तार अंसारी के भाई और उनके बेटे की नज़र अब आज़मगढ़ पर है।

इनदिनों अंसारी परिवार लगातार आज़मगढ़ का दौरा कर रहे है। जहां अब्बास अपने पिता का ज़िक्र करते हुए कहते है कि आज़मगढ़ से हमारा पुराना रिश्ता है तो मतलब साफ़ हो जाता है की वो आज़मगढ़ की जनता के साथ अपना रिश्ता कायम करना चाहते है क्योंकि अब नज़र 2019 में होने लोकसभा चुनाव पर है।

दरअसल अंसारी परिवार का यह रुख ऐसे नहीं बदला है। अब बसपा के झंडे के तले 24 अक्टूबर को आज़मगढ़ के रानी की सराय में बसपा सुप्रीमो के साथ मंच साँझा करते नज़र आयेंगें।

जनता से हर रोज जुड़ने वाले नेता अब्बास अंसारी अपनी आज़मगढ़ की जनता से जब ये कहते है जहाँ भी ज़रूरत हो मुझे बुला ले मैं हाज़िर रहूगां आपके बीच तो सियासी ज़मीन अपने आप बनने लग जाती है ।

गौरतलब है कि 1996 में मुख्तार ने मऊ विधानसभा सीट पर बीएसपी के टिकट पर 45.85% मत हासिल किया। 2002 में निर्दलीय मुख्तार को पहले से ज्यादा 46.06% मत मिले और 2007 में मुख्तार की लोकप्रियता निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर ही और बढ़ी। मुख्तार को 46.78% मत मिले। उत्तर प्रदेश में जब मोदी लहर अपने उफान पर थी  तब भी मऊ सीट से मुख्तार अंसारी एक बार फिर से जीत दर्ज करने में सफल रहे।

हालांकि उनके बेटे अब्बास को घोसी और भाई सिबगतुल्लाह को मुहम्मदाबाद में हार का सामना करना पड़ा है। मुख्तार की पार्टी कौमी एकता दल का विधानसभा चुनाव से पहले बसपा में विलय कर दिया गया था।

मुख्तार के बेटे अब्बास अंसारी मऊ जिले की घोसी सीट से जबकि भाई सिबगतुल्ला अंसारी गाजीपुर जिले की मुहम्मदाबाद (यूसुफपुर) सीट से चुनाव लड़ रहे थे।

अब आज़मगढ़ की सियासी ज़मीन अंसारी परिवार पर कितना भरोसा करती है ये तो आने वाले लोकसभा चुनाव में पता चलेगा। मगर करीब साढ़े 4 लाख की आबादी वाले इस शहर पर ज़्यादातर बसपा की भी मुस्लिम वोट बैंक पर नज़र रहेगी।

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