सजन रे झूठ मत बोलो, पेट्रोल पंप पर जाना है,

पेट्रोल के दाम 80 रुपये के पार गए तो सरकार ने कारण बताए।

लोककल्याणकारी कार्यों, शिक्षा और स्वास्थ्य पर ख़र्च करने के लिए सरकार को पैसे चाहिए। व्हाट्स अप यूनिवर्सिटी और सरकार की भाषा एक हो चुकी है। दोनों को पता है कि कोई फैक्ट तो चेक करेगा नहीं। नेताओं को पता है कि राजनीति में फैसला बेरोज़गारी, स्वास्थ्य और शिक्षा के बजट या प्रदर्शन से नहीं होता है। भावुक मुद्दों की अभी इतनी कमी नहीं हुई है, भारत में।

बहरहाल, आपको लग रहा होगा कि भारत सरकार या राज्य सरकारें स्वास्थ्य और शिक्षा पर ख़र्च कर रही होंगी इसलिए आपसे टैक्स के लिए पेट्रोल के दाम से वसूल रही हैं। इससे बड़ा झूठ कुछ और नहीं हो सकता है। आप किसी भी बजट में इन मदों पर किए जाने वाले प्रावधान देखिए, कटौती ही कटौती मिलेगी। स्वास्थ्य सेवाओं के बजट पर रवि दुग्गल और अभय शुक्ला का काम है। आप इनके नाम से ख़ुद भी करके सर्च कर सकते हैं।

भारत ने 80 के दशक में स्वास्थ्य सेवाओं पर अच्छा ख़र्च किया था, उसका असर स्वास्थ्य सेवाओं पर भी दिखा लेकिन नब्बे के दशक में उदारवादी नीतियां आते ही हम 80 के स्तर से नीचे आने लगे। स्वास्थ्य सेवाओं का बजट जीडीपी का 0.7 फीसदी रह गया। लगातार हो रही इस कटौती के कारण आम लोग मारे जा रहे हैं। उनकी कमाई का बड़ा हिस्सा महंगे इलाज पर ख़र्च हो रहा है।

यूपीए के राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन(NRHM) के कारण हेल्थ का बजट वापस जीडीपी का 1.2 प्रतिशत पर पहुंचा। इस योजना से ग्रामीण क्षेत्रों में संसाधन तो बने मगर डाक्टरों और कर्मचारियों की भयंकर कमी के कारण यह भी दम तोड़ गया। अब तो इस योजना में भी लगातार कमी हो रही है और जो बजट दिया जाता है वो पूरा ख़र्च भी नहीं होता है। तो ये हमारी प्राथमिकता का चेहरा है।

12 वीं पंचवर्षीय योजना में तय हुआ कि 2017 तक जीडीपी का 2.5 प्रतिशत हेल्थ बजट होगा। मोदी सरकार ने कहा कि हम 2020 तक 2.5 प्रतिशत ख़र्च करेंगे। जब संसद में नेशनल हेल्थ राइट्स बिल 2017 पेश हुआ तो 2.5 प्रतिशत ख़र्च करने का टारगेट 2025 पर शिफ्ट कर दिया गया। ये मामला 2022 के टारगेट से कैसे तीन साल आगे चला गया, पता नहीं। रवि दुग्गल कहते हैं कि हम हकीकत में जीडीपी का 1 फीसदी भी स्वास्थ्य सेवाओं पर ख़र्च नहीं करते हैं। सरकार के लिए स्वास्थ्य प्राथमिकता का क्षेत्र ही नहीं है। ( डी एन ए अख़बार में ये विश्लेषण छपा है)

गोरखपुर में कई सौ बच्चे मर गए। हाल ही में इंडियन एक्सप्रेस में अभय शुक्ला और रवि दुग्गल ने एक लेख लिखा। कहा कि यूपी ने जापानी बुखार और एंसिफ्लाइटिस नियंत्रण के लिए 2016-17 में केंद्र से 30.40 करोड़ मांगा, मिला 10.19 करोड़। 2017-18 में तो मांगने में भी कटौती कर दी। 20.01 करोड़ मांगा और मिला मात्र 5.78 करोड़। तो समझे, बच्चे क्यों मर रहे हैं।

रही बात कुल सामाजिक क्षेत्रों के बजट की तो अभय शुक्ला ने हिन्दू अख़बार में लिखा है कि 2015-16 में जीडीपी का 4.85 प्रतिशत सोशल सेक्टर के लिए था, जो 2016-17 में घटकर 4.29 प्रतिशत हो गया। प्रतिशत में मामूली गिरावट से ही पांच सौ हज़ार से लेकर दो तीन हज़ार करोड़ की कटौती हो जाती है। स्वास्थ्य सेवाओं के हर क्षेत्र में भयंकर कटौती की गई।

महिला व बाल विकास के बजट में 62 फीसदा की कमी कर दी गई। ICDS का बजट 2015-16 में 3568 करोड़ था, ,2016-17 में 1340 करोड़ हो गया। जगह जगह आंगनवाड़ी वर्करों के प्रदर्शन हो रहे हैं। हर राज्य में आंगनवाड़ी वर्कर प्रदर्शन कर रहे हैं।

मिंट अख़बार ने लिखा है कि यूपीए के 2009 में सोशल सेक्टर पर 10.2 प्रतिशत ख़र्च हुआ था। 2016-17 में यह घटकर 5.3 प्रतिशत आ गया है, कटौती की शुरूआत यूपीए के दौर से ही शुरु हो गई थी। सर्व शिक्षा अभियान, इंटीग्रेटेड चाइल्ड डेवलपमेंट स्कीम, मिड डे मील का बजट कम किया या है।

वही हाल शिक्षा पर किए जा रहे ख़र्च का है। आंकड़ों की बाज़ीगरी को थोड़ा सा समझेंगे तो पता चलेगा कि सरकार के लिए स्वास्थ्य और शिक्षा महत्वपूर्ण ही नहीं हैं। बीमा दे दे और ड्रामा कर दो। दो काम है।

31 मार्च 2016 के हिन्दुस्तान टाइम्स की ख़बर है कि संघ ने शिक्षा और स्वास्थ्य का बजट कम करने के लिए मोदी सरकार की आलोचना की है।
सरकार ने इन क्षेत्रों में बजट बढ़ाया होता तो समझा भी जा सकता था कि इनके लिए पेट्रोल और डीज़ल के दाम हमसे आपसे वसूले जा रहे हैं।

दरअसल खेल ये नहीं है। जो असली खेल है, उसकी कहानी हमसे आपसे बहुत दूर है। वो खेल है प्राइवेट तेल कंपनी को मालामाल करने और सरकारी तेल कंपनियों का हाल सस्ता करना। ग़रीब और आम लोगों की जेब से पैसे निकाल कर प्राइवेट तेल कंपनियों को लाभ पहुंचाया जा रहा है। दबी जुबान में सब कहते हैं मगर कोई खुलकर कहता नहीं। इसका असर आपको चुनावों में दिखेगा जब आसमान से पैसा बरसेगा और ज़मीन पर शराब बनकर वोट ख़रीदेगा। चुनाव जब महंगे होंगे तो याद कीजिएगा कि इसका पैसा आपने ही दिया है, अस्सी रुपये पेट्रोल ख़रीदकर।

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